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Mamata Banerjee: 3:30 बजे उठकर चूल्हा फूंकने वाली लड़की कैसे बनी बंगाल की सीएम?, अब BJP के चक्रव्यूह में फंसी!
Mamata Banerjee Life Story: बंगाल चुनाव के रूझानों में ममता बनर्जी का किला ढहता नजर आ रहा है। भवानीपुर सीट से वह पीछे चल रही हैं। 15 साल से सत्ता में चल रही दीदी का बचपन संघर्षों में बीता है। जानिए 3:30 बजे उठकर चूल्हा फूंकने वाली लड़की कैसे बनी CM?

ममता बनर्जी की फैमिली और बचपन
ममता बनर्जी का जन्म कोलकाता की एक छोटी सी गली, हरीश चटर्जी स्ट्रीट में हुआ था। उनका परिवार दो कमरों के मकान में रहता था। बचपन में उन्हें घर के लोग प्यार से 'मोनाबाबा' बुलाते थे। पिता सरकारी ठेकेदार थे और घर में सब ठीक चल रहा था, लेकिन जब ममता सिर्फ 15 साल की थीं, तब पिता का साया सिर से उठ गया। उस दिन ने 'मोनाबाबा' का बचपन छीन लिया। घर में बीमार मां और 5 छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी अचानक ममता के कंधों पर आ गई।
सुबह 3:30 उठना, चूल्हा फूंकना और पढ़ाई करना
तंगहाली के उस दौर में ममता की जिंदगी काफी कठिन थी। वह रोज सुबह तड़के 3:30 बजे उठ जाती थीं और चूल्हा फूंकती थीं। भाइयों के लिए खाना बनाना और उन्हें स्कूल भेजना उनकी रोज की ड्यूटी थी। इतनी गरीबी और काम के बोझ के बावजूद उन्होंने इतिहास, शिक्षाशास्त्र और वकालत की डिग्री हासिल की। यही वह समय था जब उन्होंने राजनीति की राह चुनी और कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI से जुड़ गईं।
कांग्रेस से अलग बनाई अपनी पार्टी
कांग्रेस में रहते हुए ममता को लगने लगा था कि कुछ नेता कम्युनिस्टों के साथ मिले हुए हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं को 'तरबूज' कहना शुरू कर दिया यानी ऊपर से हरा (कांग्रेस) और अंदर से लाल (कम्युनिस्ट)। इसी बगावत और सोनिया गांधी से हुई एक कड़वी मुलाकात के बाद, 1 जनवरी 1998 को ममता ने अपनी अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाई। उन्होंने खुद इसका चुनाव चिह्न (मिट्टी से उगते दो फूल) डिजाइन किया था।
बंगाल में पहली बार सत्ता में ममता बनर्जी का कब्जा
ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान एक ऐसी 'स्ट्रीट फाइटर' की रही है, जिसने अपमान का जवाब हमेशा अपनी जिद और संकल्प से दिया है। साल 1993 की वह रात उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ थी, जब एक मूक-बधिर पीड़िता के लिए न्याय मांगते हुए उन्हें सचिवालय (राइटर्स बिल्डिंग) से पुलिस ने बालों से पकड़कर सीढ़ियों से नीचे घसीटा था। आधी रात को लॉकअप में बंद होने के बाद, ममता ने उसी अपमान की आग में जलते हुए एक भीषण कसम खाई थी कि वह अब उस बिल्डिंग में तभी कदम रखेंगी, जब खुद मुख्यमंत्री बनेंगी। उनकी इस छवि को और मजबूती तब मिली जब साल 1990 में एक प्रदर्शन के दौरान उन पर जानलेवा हमला हुआ और उनके सिर पर लोहे की रॉड से वार किया गया। अस्पताल के बिस्तर पर पट्टियों में लिपटे उनके चेहरे ने बंगाल की राजनीति में एक नई 'दीदी' को जन्म दिया, जिसने आखिरकार 2011 में अपनी कसम पूरी की और 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका।
क्या बंगाल चुनाव 2026 के चक्रव्यूह में फंसी ममता दीदी
आज बंगाल की 293 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है और शुरुआती रुझान ममता बनर्जी के लिए अच्छे नहीं दिख रहे हैं। सुबह 11 बजे तक भाजपा फिलहाल 157 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि टीएमसी 115 पर सिमटती दिख रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ममता बनर्जी अपनी खुद की सीट भवानीपुर से पीछे चल रही हैं और सुवेंदु अधिकारी आगे हैं।
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