TMC Internal Conflict News: क्या टीएमसी की टूट के पीछे ममता बनर्जी नहीं कोई और है? क्या अब पार्टी पर दीदी की पकड़ कमजोर पड़ रही है? आखिर इतने सांसद और विधायक पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं? सुष्मिता देव के इस्तीफे के क्या मायने हैं? राहुल गांधी से अभिषेक की मुलाकात क्यों चर्चा में है? क्या अगले 30 दिन TMC का भविष्य तय कर सकते हैं? 

Mamata Banerjee Political Future: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त वो भूचाल आ चुका है, जिसकी कल्पना खुद ममता दीदी ने भी नहीं की होगी। 28 साल पुरानी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बगावत के निशाने पर खुद ममता बनर्जी नहीं हैं, बल्कि उंगलियां किसी और पर उठ रही हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों और बागी नेताओं की मानें तो एक खास नेता के फैसले लेने के 'कॉर्पोरेट और एकतरफा' अंदाज ने पूरी पार्टी को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस आर्टिकल में जानिए आखिर वो कौन-सा सीक्रेट टर्निंग पॉइंट था, जिसने दीदी के इतने बड़े साम्राज्य में आग लगा दी और अब अगले 30 दिनों में बंगाल की सियासत में क्या नया बवंडर आने वाला है।

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

TMC में आखिर ऐसा क्या हुआ कि पार्टी बिखरने लगी?

कुछ दिन पहले तक TMC बंगाल की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत मानी जा रही थी, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदलती नजर आ रही है। पहले विधायकों के अलग होने की खबर आई। फिर सांसदों का समर्थन खिसकने लगा। इसके बाद राज्यसभा सांसदों के इस्तीफों ने पार्टी के भीतर चल रही नाराजगी को खुलकर सामने ला दिया। न्यूज एजेंसी IANS के अनुसार, काकोली घोष की अगुवाई वाले टीएमसी बागी गुट के 19 सांसदों की लिस्ट भी सामने आ चुकी है। इस बागी खेमे की लिस्ट में ऐसे नाम भी दिखाई दिए जिन्हें कभी ममता बनर्जी का बेहद करीबी माना जाता था।

ममता बनर्जी की पार्टी में किस नेता को लेकर नाराजगी बढ़ी?

TMC के अंदर लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि पार्टी के कई बड़े फैसले कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होते जा रहे हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के एक वर्ग को लगने लगा था कि संगठन में पुराने नेताओं की भूमिका कम होती जा रही है और नए पावर सेंटर तेजी से मजबूत हो रहे हैं। हालांकि, अभिषेक बनर्जी या टीएमसी नेतृत्व ने इन आरोपों को कभी स्वीकार नहीं किया, लेकिन बागी नेताओं के बयानों और हालिया घटनाओं ने इस बहस को फिर से हवा दे दी है। यही वजह है कि अब सोशल मीडिया पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या नेतृत्व को लेकर अंदर ही अंदर नाराजगी जमा हो रही थी। बात सिर्फ नाराजगी तक नहीं रही, बल्कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुनने के मामले में कथित तौर पर फर्जी दस्तखत का विवाद सामने आया। इस कानूनी और राजनीतिक संकट ने आग में घी का काम किया, जिससे विधायकों और सांसदों का भरोसा लीडरशिप से पूरी तरह उठ गया।

टीएमसी का संकट कितना बड़ा है?

संकट सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है। लोकसभा में TMC के कई सांसद बागी खेमे के साथ दिखाई दे रहे हैं। राज्यसभा में भी इस्तीफों का दौर शुरू हो चुका है। विधानसभा में भी बड़ी संख्या में विधायक अलग रुख अपना चुके हैं। राजनीति में संख्या ही ताकत होती है और फिलहाल यही संख्या TMC के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

राहुल गांधी और सोनिया गांधी से अभिषेक की मुलाकात के क्या मायने हैं?

जब पार्टी पर संकट आता है तो नेतृत्व सक्रिय हो जाता है। इसी बीच अभिषेक बनर्जी की राहुल गांधी से मुलाकात और ममता बनर्जी की सोनिया गांधी से बातचीत ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ शिष्टाचार मुलाकात नहीं मान रहे। कई लोगों का मानना है कि TMC अपनी राष्ट्रीय राजनीतिक स्थिति को मजबूत रखने की कोशिश कर रही है।

ममता बनर्जी के लिए अगले 30 दिन क्यों हैं सबसे अहम?

ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी इस वक्त दिल्ली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के चक्कर काटकर डैमेज कंट्रोल की आखिरी कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन कोलकाता में उनका किला लगभग ढह चुकी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले 30 दिन बंगाल और देश की राजनीति के लिए बेहद अहम हैं। यही एक महीना तय कर सकता है कि राजनीति में ममता बनर्जी को किन-किन नए राजनीतिक समीकरणों का सामना करना पड़ेगा और उनका फ्यूचर क्या होगा? फिलहाल राजनीतिक जानकार 5 घटनाएं होने की बात कह रहे हैं...

1. असली TMC किसकी? यानी सिंबल की जंग

चूंकि बागी गुट के पास दो-तिहाई से ज्यादा (72% से अधिक) विधायक और सांसद हैं, इसलिए दलबदल कानून उन पर लागू होना मुश्किल है। अब लड़ाई चुनाव आयोग में जाएगी कि पार्टी का नाम और सिंबल किसका होगा?

2. कोर्ट-कचहरी के चक्कर

ममता गुट और बागी गुट के बीच कोर्ट और विधानसभा स्पीकर के सामने कानूनी लड़ाई बेहद तेज हो सकती है।

3. स्थानीय निकायों में हड़कंप

जिला स्तर के नेता, मेयर और पंचायत सदस्य भी अब अपना-अपना पाला चुन सकते हैं, जिससे जमीनी स्तर पर टीएमसी दो फाड़ होने का खतरा है।

4. विपक्ष का फायदा

बीजेपी और कांग्रेस इस अंदरूनी लड़ाई पर पैनी नजर रखे हुए हैं, ताकि बंगाल के इस सबसे बड़े सियासी वैक्यूम का पूरा फायदा उठाया जा सके।

5. नया मोर्चा या विलय

बहुत जल्द बागी गुट एक नए राजनीतिक दल के रूप में सामने आ सकता है या एनडीए सरकार के साथ अपनी नई पारी की शुरुआत कर सकता है।