NASA Scientist Near Death Experience: NASA की पूर्व वैज्ञानिक इंग्रिड होनकाला ने दावा किया है कि वह तीन बार मौत के करीब पहुंचीं और हर बार उन्होंने दूसरी दुनिया का अनुभव किया। क्या मौत अंत नहीं? जानिए उनके रहस्यमयी Near Death Experience और विज्ञान-आध्यात्मिकता पर बड़ा दावा।
Ingrid Honkala Story: क्या मौत सच में जिंदगी का आखिरी पड़ाव है, या फिर इसके बाद किसी और दुनिया का दरवाजा खुलता है? सदियों से इंसान इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करता रहा है. विज्ञान इसे शरीर की अंतिम अवस्था मानता है, जबकि आध्यात्मिक मान्यताएं मृत्यु के बाद चेतना के अस्तित्व की बात करती हैं. अब नासा की पूर्व वैज्ञानिक इंग्रिड होनकाला के दावों ने इस बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है.

कोलंबिया के बोगोटा में जन्मीं इंग्रिड होनकाला का कहना है कि वह तीन बार मौत के बेहद करीब पहुंचीं और हर बार उन्होंने एक ऐसी रहस्यमयी दुनिया का अनुभव किया, जिसे शब्दों में पूरी तरह बयान करना आसान नहीं है. उनका दावा है कि मृत्यु के उस पार डर नहीं, बल्कि गहरी शांति और प्रकाश से भरी चेतना मौजूद है.
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2 साल की उम्र में पहला Near Death Experience
इंग्रिड के मुताबिक, उनका पहला Near Death Experience तब हुआ जब वह सिर्फ 2 साल की थीं. वह घर के पास मौजूद बर्फीले पानी के एक टैंक में गिर गई थीं. ठंडे पानी में सांस रुकने लगी और शरीर जवाब देने लगा. लेकिन तभी उन्हें अचानक एक अजीब सी शांति महसूस हुई.
इंग्रिड बताती हैं कि उन्हें ऐसा लगा जैसे वह अपने शरीर से बाहर निकल चुकी हैं. उन्होंने खुद को ऊपर से देखा और उसी दौरान अपनी मां को घर से दूर ऑफिस जाते हुए भी महसूस किया. उनका दावा है कि उन्होंने मन ही मन मां से संपर्क किया, जिसके बाद उनकी मां को अचानक किसी अनहोनी का एहसास हुआ और वह तुरंत घर लौट आईं. समय रहते उन्हें पानी के टैंक से बाहर निकाला गया और उनकी जान बच गई.
“मौत के बाद समय का कोई अस्तित्व नहीं था”
अब 55 साल की हो चुकी इंग्रिड कहती हैं कि मौत का अनुभव भयावह नहीं था. उनके अनुसार, उस अवस्था में समय जैसे खत्म हो गया था. उन्होंने खुद को शरीर के रूप में नहीं, बल्कि प्रकाश और ऊर्जा के रूप में महसूस किया. इंग्रिड का दावा है कि उन्हें ऐसा अहसास हुआ कि ब्रह्मांड की हर चीज आपस में जुड़ी हुई है. उन्होंने कुछ “दिव्य आकृतियों” से संवाद करने का अनुभव भी साझा किया. उनका कहना है कि वहां किसी तरह का दर्द, डर या बेचैनी नहीं थी, बल्कि केवल गहरी शांति थी.
25 और 52 की उम्र में फिर मौत के करीब पहुंचीं
इंग्रिड की कहानी सिर्फ बचपन तक सीमित नहीं रही. 25 साल की उम्र में वह एक गंभीर बाइक हादसे का शिकार हुईं. इसके बाद 52 साल की उम्र में एक सर्जरी के दौरान उनका ब्लड प्रेशर अचानक बेहद नीचे चला गया. दोनों घटनाओं में वह मौत के बेहद करीब पहुंचीं. वह कहती हैं कि हर बार उन्हें वही शांतिपूर्ण अनुभव महसूस हुआ. इंग्रिड के शब्दों में, “अब मुझे मौत से बिल्कुल डर नहीं लगता. हर बार ऐसा लगा जैसे मैं उसी रोशनी और शांति वाली जगह पर लौट रही हूं.”
विज्ञान बनाम आध्यात्मिकता की बहस फिर तेज
इंग्रिड होनकाला सिर्फ आध्यात्मिक दावे करने वाली कोई सामान्य शख्सियत नहीं हैं. उन्होंने मैरीन साइंस में पीएचडी की है और नासा के साथ-साथ अमेरिकी नेवी में भी काम कर चुकी हैं. यही वजह है कि उनके अनुभवों ने वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों समुदायों का ध्यान खींचा है.
हालांकि, आलोचक इन अनुभवों को दिमाग में ऑक्सीजन की कमी या न्यूरोलॉजिकल भ्रम का परिणाम मानते हैं. कई वैज्ञानिकों का कहना है कि मौत के करीब पहुंचने पर मस्तिष्क असामान्य प्रतिक्रियाएं देने लगता है, जिससे ऐसे दृश्य और अनुभव महसूस हो सकते हैं. लेकिन इंग्रिड इससे सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि विज्ञान और आध्यात्मिकता विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने के अलग-अलग रास्ते हैं.
किताब में लिखा- “मृत्यु अंत नहीं”
अपनी आने वाली किताब Dying to See the Light में इंग्रिड ने लिखा है कि चेतना केवल दिमाग की उपज नहीं है. उनके मुताबिक, चेतना ब्रह्मांड का एक मूल हिस्सा है और मृत्यु सिर्फ एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन भर है. उनके दावे भले ही वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह साबित न हुए हों, लेकिन उन्होंने एक बार फिर उस सवाल को जिंदा कर दिया है, जिसका जवाब इंसान हजारों सालों से तलाश रहा है — क्या मौत सच में अंत है?
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