गुरुग्राम से शुरू हुआ मजदूरों का प्रदर्शन नोएडा में हिंसक हो गया। बढ़ती महंगाई के बीच, मजदूर न्यूनतम वेतन ₹18,000-₹20,000 करने और बेहतर काम के हालात की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शन में तोड़फोड़ और आगजनी हुई, जिसके बाद सरकार समाधान खोज रही है।

नोएडा में फैक्ट्री मजदूरों का जो हालिया प्रदर्शन है, वो अचानक शुरू नहीं हुआ। इस महीने की शुरुआत में गुरुग्राम के इंडस्ट्रियल बेल्ट, खासकर मानेसर में, इस आंदोलन की नींव पड़ी थी। वहां हजारों मजदूर बढ़ती महंगाई के बीच न्यूनतम वेतन में संशोधन की मांग कर रहे थे। मजदूरों ने बताया कि उनकी कमाई और खर्चों के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। जरूरी चीजों और घर के खर्चों में भारी बढ़ोतरी हुई है। कई मजदूरों ने दावा किया कि वे महीने के सिर्फ ₹11,000 में गुजारा कर रहे हैं, जिसमें किराया, खाना और बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है।

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लगातार चले प्रदर्शनों के बाद हरियाणा सरकार ने न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी का ऐलान तो किया, लेकिन यह जानकारी सभी मजदूरों तक ठीक से नहीं पहुंची। इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई और आंदोलन और तेज हो गया। मानेसर में पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसके बाद हालात बिगड़ गए और हिंसा और तोड़फोड़ शुरू हो गई। जल्द ही यह आग पड़ोसी इंडस्ट्रियल हब, जैसे फरीदाबाद और नोएडा तक फैल गई। इन इलाकों के मजदूरों ने भी वेतन बढ़ाने और काम के बेहतर हालात की मांग उठानी शुरू कर दी।

नोएडा में क्यों भड़की हिंसा?

नोएडा में प्रदर्शन कई दिनों से चल रहा था, लेकिन फेज 2 और सेक्टर 59, 60, 62 जैसे इंडस्ट्रियल इलाकों में यह हिंसक हो गया। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, जिसमें पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ की खबरें आईं। गुस्से में मजदूरों ने गाड़ियों में आग लगा दी और फैक्ट्रियों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।

“गाड़ियों और संपत्तियों में तोड़फोड़ की गई और पत्थर फेंके गए…”

मजदूरों के बड़े-बड़े झुंड सड़कों पर उतर आए और मुख्य सड़कों को जाम कर दिया। खासकर नोएडा को दिल्ली से जोड़ने वाले रास्तों पर ट्रैफिक ठप हो गया, जिससे आने-जाने वाले लोग घंटों फंसे रहे। कई फैक्ट्रियों के मजदूर एक साथ आ गए, जिससे प्रदर्शन का दायरा बढ़ गया और कई इलाकों में औद्योगिक काम पूरी तरह बंद हो गया। हालात को संभालने के लिए अधिकारियों ने भारी पुलिस बल तैनात किया, जिसमें प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी (PAC) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) भी शामिल थी। खबरों के मुताबिक, स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कुछ इलाकों में "न्यूनतम बल" और आंसू गैस का इस्तेमाल किया।

मजदूरों की मांगें क्या हैं?

इस पूरे प्रदर्शन के केंद्र में वेतन और काम के हालात को लेकर लंबे समय से चली आ रही शिकायतें हैं। मजदूर अपनी सैलरी में अच्छी-खासी बढ़ोतरी चाहते हैं। कुछ लोगों की मांग है कि उनका मासिक वेतन ₹18,000 से ₹20,000 के बीच होना चाहिए।

मुख्य मांगें ये हैं…

• बढ़ती महंगाई के हिसाब से न्यूनतम वेतन में संशोधन हो।

• काम के घंटे तय हों और ओवरटाइम का सही पैसा मिले।

• सैलरी और बोनस समय पर दिया जाए।

• काम की जगह पर बेहतर सुरक्षा और मेडिकल सुविधाएं मिलें।

एक प्रदर्शनकारी ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा:

“ड्यूटी के घंटे तय होने चाहिए, ओवरटाइम का पैसा मिलना चाहिए।”

मजदूरों ने राज्यों के बीच वेतन में असमानता का भी मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि हरियाणा में वेतन वृद्धि के बाद एनसीआर क्षेत्र में गैर-बराबरी पैदा हो गई है। यह प्रदर्शन औद्योगिक केंद्रों में मजदूरों के काम करने के हालात पर एक बड़ी बहस छेड़ता है, जहां उन्हें अक्सर कम वेतन, लंबे समय तक काम और सीमित सुविधाओं के साथ गुजारा करना पड़ता है।

सरकार का जवाब और आगे क्या होगा?

अधिकारियों ने हिंसा को रोकने और स्थिति को और बिगड़ने से बचाने के लिए तेजी से कदम उठाए हैं। प्रभावित इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है और वरिष्ठ अधिकारी इस संकट को हल करने के लिए मजदूर प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शांति की अपील की है। उन्होंने मजदूरों को आश्वासन दिया कि सरकार "आपके साथ खड़ी है", साथ ही उन्होंने अशांति भड़काने की कोशिश करने वालों को चेतावनी भी दी।

प्रशासनिक स्तर पर भी कई कदम उठाए जा रहे हैं, जैसे समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करना, श्रम कानूनों को लागू करना और काम के माहौल में सुधार करना। कुछ इलाकों में कंट्रोल रूम बनाए गए हैं और अधिकारियों, मजदूर यूनियनों और फैक्ट्री मैनेजमेंट के बीच बातचीत चल रही है।

इन कोशिशों के बावजूद तनाव अभी भी बना हुआ है। इन प्रदर्शनों ने औद्योगिक गतिविधियों को बाधित किया है, सप्लाई चेन पर असर डाला है और भारत के तेजी से बढ़ते औद्योगिक गलियारों में मजदूर अधिकारों पर एक व्यापक बहस छेड़ दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वेतन और काम के हालात से जुड़ी चिंताओं को व्यवस्थित तरीके से दूर नहीं किया गया, तो दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में भी इस तरह के आंदोलन देखने को मिल सकते हैं। नोएडा का यह प्रदर्शन एक गहरी समस्या को उजागर करता है - भारत के सबसे महत्वपूर्ण मैन्युफैक्चरिंग बेल्ट में से एक में आर्थिक विकास और मजदूरों के उचित अधिकारों के बीच संतुलन बनाना।