Russia Belarus Nuclear Deal: रूस बेलारूस में परमाणु हथियार तैनात करने की तैयारी तेज कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक बेलारूस को करीब 10 न्यूक्लियर हथियार मिल सकते हैं। जवानों को ट्रेनिंग दी जा रही है, जिससे अमेरिका और नाटो देशों की चिंता बढ़ सकती है।

Belarus Nuclear Deployment: दुनिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच रूस एक बार फिर अपने बड़े रणनीतिक कदम को लेकर चर्चा में है। यूक्रेन युद्ध के बीच अब रूस अपने करीबी सहयोगी बेलोरूस में परमाणु हथियार तैनात करने की तैयारी को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक बेलारूस को जल्द ही रूस की ओर से करीब 10 परमाणु हथियार मिल सकते हैं।

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यह मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि एक तरफ अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए सख्त नीति अपना रहा है, वहीं दूसरी तरफ रूस यूरोप की सीमा के बेहद करीब अपने परमाणु प्रभाव को बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

बेलारूस ने शुरू की परमाणु प्रशिक्षण प्रक्रिया

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार बेलारूस सरकार ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि उसके जवानों को परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और संचालन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि इस ट्रेनिंग में रूस के विशेषज्ञ और वैज्ञानिक शामिल हैं, जो पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। रूस और बेलारूस दोनों इस पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। बेलारूस रक्षा मंत्रालय ने भी संकेत दिए हैं कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद रूस वहां परमाणु हथियारों की तैनाती शुरू कर सकता है।

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2023 में पुतिन ने किया था बड़ा ऐलान

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वर्ष 2023 में पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि रूस बेलारूस में परमाणु हथियार तैनात करेगा। उसी दौरान बेलारूस ने अपने संविधान में संशोधन भी किया था, जिससे उसके क्षेत्र में परमाणु हथियारों की तैनाती का रास्ता साफ हो गया। पुतिन ने उस समय कहा था कि शुरुआती चरण में लगभग 10 हथियार बेलारूस में तैनात किए जा सकते हैं। हालांकि रूस का दावा था कि इन हथियारों के नियंत्रण और इस्तेमाल का अधिकार मॉस्को के पास ही रहेगा। लेकिन अब बेलारूस के सैनिकों को ट्रेनिंग दिए जाने की खबरों ने इस दावे पर नई बहस छेड़ दी है।

रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु भंडार

विशेषज्ञों के मुताबिक रूस दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु शक्ति संपन्न देश माना जाता है। Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार रूस के पास 5000 से ज्यादा परमाणु हथियार मौजूद हैं। रूस के पास कई आधुनिक इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) भी हैं, जिनमें:

  • RS-28 Sarmat
  • RS-24 Yars
  • Topol-M (SS-27)

जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल हैं। हाल ही में रूस ने नई लंबी दूरी की मिसाइल प्रणाली को लेकर भी बयान दिया था, जिसकी मारक क्षमता हजारों किलोमीटर तक बताई जा रही है।

बेलारूस रूस के लिए इतना अहम क्यों?

बेलोरूस रूस का सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार माना जाता है। इसकी सीमा यूक्रेन, रूस और नाटो देशों के बेहद करीब है। यही वजह है कि मॉस्को बेलारूस को यूरोप पर रणनीतिक दबाव बनाने के लिए महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र के तौर पर देखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बेलारूस में परमाणु हथियारों की स्थायी तैनाती होती है, तो इससे यूरोप और नाटो देशों की सुरक्षा चिंताएं और बढ़ सकती हैं।

यूक्रेन युद्ध से जुड़ी बड़ी रणनीति?

बेलारूस और यूक्रेन के बीच करीब 1000 किलोमीटर लंबी सीमा है। यूक्रेन युद्ध के दौरान बेलारूस पहले भी रूस को लॉजिस्टिक और रणनीतिक समर्थन देता रहा है। अब परमाणु हथियारों की तैनाती को रूस की बड़ी सैन्य रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि रूस इस कदम के जरिए पश्चिमी देशों को यह संदेश देना चाहता है कि वह युद्ध के दायरे को और व्यापक करने की क्षमता रखता है।

अमेरिका और नाटो की बढ़ सकती है चिंता

रूस और बेलारूस के इस कदम से अमेरिका और नाटो देशों की चिंता बढ़ना तय माना जा रहा है। खासकर ऐसे समय में जब यूरोप पहले से ही यूक्रेन युद्ध, सैन्य तनाव और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। हालांकि अभी तक रूस ने यह साफ नहीं किया है कि परमाणु हथियारों की अंतिम तैनाती कब तक पूरी होगी। लेकिन बेलारूस में चल रही सैन्य ट्रेनिंग ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि मॉस्को अपनी रणनीति को तेजी से आगे बढ़ा रहा है।

वैश्विक सुरक्षा पर क्या होगा असर?

परमाणु हथियारों की तैनाती केवल दो देशों का मामला नहीं होती, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। यदि रूस बेलारूस में स्थायी रूप से परमाणु हथियार तैनात करता है, तो इससे यूरोप में सैन्य संतुलन बदल सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले महीनों में अमेरिका, नाटो और यूरोपीय देशों की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी।

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