Political Party Spokesperson Salary: शहजाद पूनावाला के इस्तीफे ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी राजनीति पार्टी का प्रवक्ता होना एक नौकरी है? आखिर पार्टी के प्रवक्ताओं को सैलरी क्यों नहीं मिलती और उनका खर्च कैसे चलता है?

Political Spokesperson Salary in India: टीवी डिबेट्स में बीजेपी का पक्ष मजबूती से रखने वाले शहजाद पूनावाला के इस्तीफे ने राजनीति के एक ऐसे पहलू पर चर्चा छेड़ दी है, जिस पर आमतौर पर ज्यादा बात नहीं होती, क्या राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ता कोई सैलरी पाते हैं? पूनावाला ने इस्तीफे की वजह बताते हुए अपनी आर्थिक परेशानियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर उन्हें कोई नियमित वेतन नहीं मिलता था और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि बीजेपी समेत अन्य राजनीति पार्टियां प्रवक्ताओं को सैलरी क्यों नहीं देतीं?

क्या किसी राजनीतिक पार्टी का प्रवक्ता होना एक नौकरी है?

सीधी बात यह है कि आम तौर पर पार्टी का प्रवक्ता होना नियमित नौकरी जैसा पद नहीं होता। प्रवक्ता की जिम्मेदारी पार्टी की नीतियों और फैसलों को मीडिया, टीवी डिबेट और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए जनता तक पहुंचाना होती है। लेकिन इस पद के साथ किसी सरकारी नौकरी की तरह तय मासिक वेतन या पे-स्केल जुड़ा नहीं होता। यही वजह है कि किसी नेता को राष्ट्रीय प्रवक्ता बना दिए जाने का मतलब यह नहीं है कि उसे हर महीने पार्टी की तरफ से तय सैलरी मिलेगी।

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राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ताओं को सैलरी क्यों नहीं मिलती?

भारतीय राजनीति में पार्टी के पदों को लंबे समय से संगठन और राजनीतिक जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाता रहा है। बड़ी पार्टियों में हजारों कार्यकर्ता और अलग-अलग पदाधिकारी होते हैं। हर राजनीतिक पद को वेतन वाली नौकरी में बदलना पार्टियों के लिए अलग तरह की आर्थिक व्यवस्था खड़ी कर सकता है। इसके अलावा कई प्रवक्ता पहले से सांसद, विधायक, पूर्व मंत्री, वकील, कारोबारी या किसी दूसरे पेशे से जुड़े होते हैं। ऐसे लोगों की आय का स्रोत प्रवक्ता का पद नहीं, बल्कि उनका दूसरा काम या निर्वाचित पद हो सकता है।

क्या हर राजनीतिक पार्टी का प्रवक्ता बिना पैसे के काम करता है?

ऐसा कहना सही नहीं होगा। पार्टियों में प्रशासन, मीडिया, रिसर्च और दूसरे कामों के लिए कर्मचारियों और प्रोफेशनल्स को भुगतान किया जा सकता है। लेकिन सिर्फ प्रवक्ता नियुक्त होने से नियमित सैलरी मिलना जरूरी नहीं है। भुगतान की व्यवस्था पार्टी और व्यक्ति की भूमिका के हिसाब से अलग हो सकती है।

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शहजाद पूनावाला के मामले ने क्यों खड़े किए सवाल?

पूनावाला ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि घर का किराया और रोजमर्रा के खर्च राजनीति से नहीं चलते। उनका कहना था कि राजनीतिक पार्टियां अपने प्रवक्ताओं को सैलरी नहीं देतीं और उनके लिए आर्थिक रूप से राजनीति में बने रहना मुश्किल हो रहा था। सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों के दौर में प्रवक्ताओं की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। उन्हें लगातार टीवी डिबेट, मीडिया प्रतिक्रियाओं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पार्टी का पक्ष रखना पड़ता है। ऐसे में पूनावाला का इस्तीफा एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है कि अगर कोई व्यक्ति राजनीति को पूर्णकालिक रूप से अपना करियर बनाता है, लेकिन उसके पास न राजनीतिक विरासत है और न कोई दूसरा नियमित आय का जरिया, तो वह अपना घर कैसे चलाए?