स्टॉकहोम के एक इंस्टीट्यूट की 2026 की ईयरबुक में दो देशों के बीच होने वाले सशस्त्र संघर्षों के दोगुना होने का रिकॉर्ड है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में सेना पर 2.9 ट्रिलियन डॉलर का रिकॉर्ड खर्च हुआ और भारत-पाकिस्तान के बीच टकराव में पहली बार साइबर वॉरफेयर का इस्तेमाल देखा गया।

नई दिल्ली: मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक सैन्य टकराव हुआ था। यह पहली बार था जब इन दोनों परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के बीच किसी सैन्य संघर्ष में साइबर ऑपरेशन का भी खुलकर इस्तेमाल हुआ। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने इस हफ्ते जारी अपनी सालाना ईयरबुक में इस घटना को दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए एक अहम मोड़ बताया है।

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SIPRI ईयरबुक 2026 को दुनिया भर में सैन्य ट्रेंड्स पर सबसे करीबी नजर रखने वाली रिपोर्ट माना जाता है। यह रिपोर्ट एक ऐसी दुनिया की तस्वीर पेश करती है जहां हथियारों पर नियंत्रण के नियम कमजोर पड़ रहे हैं, बड़ी ताकतों के बीच होड़ तेज हो गई है और नई सैन्य तकनीकें तेजी से फैल रही हैं। रिपोर्ट इसे "एक अस्थिर रणनीतिक माहौल" कहती है, जिसमें अब बचाव के लिए कोई खास संस्थागत उपाय नहीं बचे हैं।

भारत-पाकिस्तान संकट

7 से 10 मई के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पार से हुई गोलीबारी दो दशकों से भी ज्यादा समय में दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य संकट था। SIPRI ने इस टकराव को 2025 में दुनिया भर में दर्ज किए गए छह अंतर-राज्यीय सशस्त्र संघर्षों में से एक बताया है। यह संख्या 2024 में दर्ज तीन संघर्षों से दोगुनी है। रिपोर्ट ने इसके साइबर पहलू को एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक डेवेलपमेंट बताया है।

पारंपरिक सैन्य बल के साथ-साथ साइबर ऑपरेशन का खुला इस्तेमाल इस बात का संकेत है कि दक्षिण एशिया में भविष्य के संघर्ष कैसे लड़े जाएंगे। सुरक्षा विश्लेषक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि साइबर क्षमताओं को पारंपरिक युद्ध में शामिल करने से कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम जटिल हो जाता है और गलतफहमी का खतरा बढ़ जाता है, खासकर उन दो देशों के बीच जिनके पास परमाणु हथियार हैं और बातचीत के रास्ते भी सीमित हैं। 2025 में भारत का रक्षा खर्च 8.9 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि के साथ 92.1 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जिससे यह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन गया।

वहीं, पाकिस्तान 2021 से 2025 तक पांच साल की अवधि में दुनिया के शीर्ष पांच हथियार खरीदारों में शामिल रहा। इस लिस्ट में यूक्रेन, भारत, सऊदी अरब और कतर भी थे। इन सबने मिलकर दुनिया के कुल प्रमुख हथियारों के आयात का 35 प्रतिशत हिस्सा खरीदा।

चीन का बढ़ता जखीरा

SIPRI का अनुमान है कि 2025 के दौरान चीन के परमाणु हथियारों का भंडार 600 से बढ़कर लगभग 620 हो गया। यह एक ऐसे आधुनिकीकरण और विस्तार कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसके बारे में विश्लेषकों का कहना है कि इसके धीमे होने के कोई संकेत नहीं हैं। चीन लगभग 336 बिलियन डॉलर के अनुमानित खर्च के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बना रहा। यह पिछले साल की तुलना में 7.4 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि है।

रिपोर्ट इंडो-पैसिफिक में बढ़ते नौसैनिक परमाणु पहलू पर भी प्रकाश डालती है। इस क्षेत्र के सभी चार परमाणु-सशस्त्र देशों - चीन, भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया - के बीच पनडुब्बी-आधारित परमाणु डिलीवरी सिस्टम बढ़ रहे हैं। SIPRI का कहना है कि यह एक ऐसी नौसैनिक परमाणु हथियारों की दौड़ की आशंका को बढ़ाता है, जहां पहले से ही क्षेत्रीय दावों और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता को लेकर विवाद हैं।

चीन का सैन्य निर्माण अमेरिका के साथ टेक्नोलॉजी, व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्रों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की पृष्ठभूमि में हो रहा है। वाशिंगटन ने इसका जवाब भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया सहित क्षेत्रीय भागीदारों के साथ रक्षा संबंधों को गहरा करके और क्वाड ढांचे के तहत सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को मजबूत करके दिया है। इन वजहों से एक एक्शन-रिएक्शन का चक्र बन गया है, जिसके चलते पूरे क्षेत्र में सैन्य खर्च बढ़ रहा है।

दुनिया भर में रिकॉर्ड खर्च

2025 में वैश्विक सैन्य खर्च 2.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो एक नया रिकॉर्ड है और लगातार ग्यारहवीं सालाना बढ़ोतरी है। NATO सदस्यों ने जून 2025 में द हेग में हुए अपने शिखर सम्मेलन में अपने सामूहिक खर्च लक्ष्य को सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत तक बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। यह लंबे समय से चले आ रहे 2 प्रतिशत के बेंचमार्क से एक बड़ी वृद्धि है, जिसे पूरा करने के लिए कई देश संघर्ष कर रहे थे। कुल मिलाकर यूरोपीय रक्षा बजट में 14 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई, जिसका मुख्य कारण यूक्रेन में जारी युद्ध और 2022 में रूस के पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद खतरे की बदली हुई धारणा है।

रिपोर्ट के नतीजों को पेश करते हुए SIPRI के निदेशक करीम हग्गाग ने कहा कि कमजोर होते हथियार नियंत्रण ढांचे, नई सैन्य प्रौद्योगिकियों और बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मेल ऐसी अस्थिरता पैदा कर रहा है, जिससे निपटने के लिए मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थान तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा, "गलतफहमी और तनाव बढ़ने के लिए जो ढांचागत स्थितियां हैं, वे और खराब हो रही हैं।" उन्होंने बहुपक्षीय हथियार नियंत्रण और जोखिम कम करने वाले तंत्र में नए सिरे से निवेश का आह्वान किया।

दक्षिण एशिया के विशेष जोखिम

दक्षिण एशिया में जोखिम के कई कारक एक साथ मौजूद हैं। 1947 में आजादी के बाद से भारत और पाकिस्तान तीन पूर्ण युद्ध और कई छोटे सैन्य टकराव लड़ चुके हैं, जिनमें 1999 का कारगिल संघर्ष और 2019 का पुलवामा हमले के बाद हुआ हवाई टकराव शामिल है। दोनों देशों ने परमाणु निवारक सिद्धांतों को अपनाया है जिनमें अस्पष्टता के तत्व हैं। अब इस मिश्रण में साइबर क्षमताओं के जुड़ने से तनाव बढ़ने के नए रास्ते खुल गए हैं, जिनसे निपटने के लिए मौजूदा विश्वास-बहाली के उपाय डिजाइन नहीं किए गए थे।

भारत ने पाकिस्तान और चीन दोनों से खतरे को मैनेज करने के लिए सैन्य आधुनिकीकरण, कूटनीतिक विविधीकरण और रणनीतिक साझेदारी का सहारा लिया है। इसका रक्षा बजट दो-मोर्चों की इसी चुनौती को दर्शाता है। गंभीर आर्थिक कठिनाइयों से घिरे होने के बावजूद, पाकिस्तान ने सैन्य समानता बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से चीन से हथियारों के ट्रांसफर पर बहुत अधिक भरोसा किया है।