अंतरिक्ष में उबर की तरह बुक होगी कैब? स्काईरूट का विक्रम-1 रचने जा रहा है बड़ा इतिहास। चावल के दाने से छोटी मूर्तियों और हीरों के कमल के साथ रवाना होने वाले इस मिशन में आखिर क्या है ऐसा रहस्य जो दुनिया हैरान है? जानिए इसकी ताकत, मिशन आगमन और भारत को मिलने वाली ऐतिहासिक उपलब्धि।

श्रीहरिकोटा: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस तरह हम अपने स्मार्टफोन से एक टैक्सी या कैब बुक करते हैं, ठीक उसी तरह कोई कंपनी अंतरिक्ष में अपना सैटेलाइट भेजने के लिए एक पूरा रॉकेट बुक कर ले? सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन शनिवार सुबह 11:30 बजे भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर इसी हकीकत को अंजाम देने जा रहा है। हैदराबाद की प्राइवेट कंपनी 'स्काईरूट एयरोस्पेस' अपना पहला ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च करने के लिए पूरी तरह तैयार है। सतीश धवन स्पेस सेंटर से होने वाली यह 16 मिनट की उड़ान भारत के अंतरिक्ष इतिहास को हमेशा के लिए बदल सकती है।

'राइडशेयर' का अंत या छोटे सैटेलाइट्स के लिए वरदान?

अब तक दुनिया भर में छोटे सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजने के लिए किसी बड़े सरकारी रॉकेट (जैसे ISRO का PSLV) में बची हुई जगह का इंतजार करना पड़ता था। इसे तकनीकी भाषा में 'राइडशेयर' या सेकेंडरी पेलोड कहा जाता है। इसका नुकसान यह था कि छोटी कंपनियों को बड़े मिशन के हिसाब से महीनों या सालों इंतजार करना पड़ता था और वे अपनी मर्जी की कक्षा (Orbit) भी नहीं चुन पाती थीं। विक्रम-1 इसी मजबूरी को खत्म करने आ रहा है। यह सात मंजिला ऊंचा रॉकेट 350 किलोग्राम तक के पेलोड को सीधे 'लो अर्थ ऑर्बिट' (पृथ्वी की निचली कक्षा) में स्थापित कर सकता है। स्काईरूट के सीईओ पवन कुमार चंदाना के मुताबिक, यह "स्पेस के लिए एक कैब सर्विस" है। यानी जब आपकी मर्जी हो, अपना रॉकेट बुक करो और अपने सैटेलाइट को मनचाही जगह पर पहुंचाओ।

क्या सच में ऑर्बिट तक कैब बुक करने जैसा होगा सफर?

स्काईरूट एयरोस्पेस अपने मॉडल को "स्पेस के लिए कैब सर्विस" कहता है। इसका मतलब है कि छोटे सैटेलाइट ऑपरेटर्स को अब किसी बड़े रॉकेट में खाली जगह मिलने का महीनों या वर्षों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। जिस तरह लोग अपनी सुविधा के अनुसार कैब बुक करते हैं, उसी तरह कंपनियां भविष्य में अपने सैटेलाइट के लिए मनचाही तारीख और मनचाही ऑर्बिट चुनकर लॉन्च बुक कर सकेंगी। यही वजह है कि विक्रम-1 को भारत के स्पेस सेक्टर का संभावित गेम-चेंजर माना जा रहा है।

विक्रम-1 आखिर इतना खास क्यों है?

करीब सात मंजिला ऊंचा विक्रम-1 एक मल्टी-स्टेज लॉन्च व्हीकल है, जिसे 350 किलोग्राम तक का पेलोड लगभग 450 किलोमीटर ऊंची लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) तक पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है। अब तक छोटे सैटेलाइट्स को बड़े मिशनों के साथ सेकेंडरी पेलोड के रूप में भेजा जाता था। इससे समय और ऑर्बिट दोनों पर समझौता करना पड़ता था। विक्रम-1 इसी समस्या का समाधान पेश करता है। अगर यह मॉडल सफल रहा, तो भारत अमेरिका की रॉकेट लैब जैसी कंपनियों की श्रेणी में पहुंच सकता है।

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मिशन आगमन में क्या-क्या जाएगा अंतरिक्ष? चावल के दाने से भी छोटी मूर्तियां और अंतरिक्ष का रोबोट

इस ऐतिहासिक मिशन को 'मिशन आगमन' नाम दिया गया है। इस रॉकेट के साथ 6 पेलोड अंतरिक्ष में जा रहे हैं, जिनमें से कुछ बेहद रहस्यमयी और अनूठे हैं। पृथ्वी की निगरानी करने वाले कैमरों के अलावा, इस मिशन में एक ऐसा रोबोटिक आर्म (हाथ) भेजा जा रहा है, जो अंतरिक्ष में तैर रहे खतरनाक कचरे को साफ करने की तकनीक का परीक्षण करेगा। यही नहीं, इस रॉकेट में भारत की संस्कृति और विज्ञान का एक अनोखा संगम भी देखने को मिलेगा। रॉकेट के भीतर लैब में बने हीरों से तैयार एक कमल का फूल 'कॉसमिक ब्लूम' रखा गया है। इसके साथ ही सोने के एक नन्हे रॉकेट के अंदर भारत के तीन महान सपूतों-सी.वी. रमन, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और डॉ. विक्रम साराभाई-के माइक्रो-स्कल्पचर (सूक्ष्म मूर्तियां) रखे गए हैं, जिनका आकार एक चावल के दाने से भी छोटा है!

विक्रम-S तो बस झांकी थी, असली परीक्षा तो अब शुरू होगी!

स्काईरूट ने नवंबर 2022 में 'विक्रम-S' नामक रॉकेट लॉन्च करके खूब सुर्खियां बटोरी थीं, लेकिन वह सिर्फ एक सब-ऑर्बिटल उड़ान थी। यानी रॉकेट अंतरिक्ष तक गया और वापस समुद्र में गिर गया। शनिवार को होने वाला विक्रम-1 का मिशन उससे हजार गुना ज्यादा जटिल है। ऑर्बिटल लॉन्च का मतलब है कि रॉकेट को न सिर्फ अंतरिक्ष में पहुंचना है, बल्कि उसे एक निश्चित और बेहद सटीक रफ्तार पकड़नी होगी ताकि सैटेलाइट्स पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बचकर उसकी कक्षा में लगातार चक्कर काट सकें। इतिहास गवाह है कि दुनिया की सबसे बड़ी प्राइवेट स्पेस कंपनी 'स्पेसएक्स' (SpaceX) भी अपने शुरुआती तीन प्रयासों में फेल रही थी और उसे चौथी बार में कामयाबी मिली थी। ऐसे में विक्रम-1 की यह 16 मिनट की पहली उड़ान स्काईरूट के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

हर महीने एक रॉकेट: क्या भारत बनेगा ग्लोबल स्पेस मार्केट का किंग?

2018 में ISRO के दो पूर्व इंजीनियरों द्वारा शुरू किया गया यह स्टार्ट-अप आज $1.1 अरब (यूनिकॉर्न) की कंपनी बन चुका है। भारत सरकार ने साल 2020 में जब स्पेस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोला, तब किसी ने नहीं सोचा था कि महज कुछ सालों में देश में 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्ट-अप खड़े हो जाएंगे। भारत का लक्ष्य 2030 तक ग्लोबल स्पेस मार्केट में अपनी हिस्सेदारी को 2% से बढ़ाकर 10% करना है। स्काईरूट ने दावा किया है कि हैदराबाद स्थित उनकी फैक्ट्री में हर महीने एक नया रॉकेट बनाने की क्षमता है। अगर शनिवार का यह टेस्ट सफल रहता है, तो अगले साल से कमर्शियल बुकिंग शुरू हो जाएगी, जिसका 80% बिजनेस विदेशी बाजारों से आने की उम्मीद है। पूरी दुनिया की नजरें अब श्रीहरिकोटा के लॉन्च पैड पर टिकी हैं!

भारत को क्या मिलेगा सबसे बड़ा फायदा?

अगर विक्रम-1 सफल रहता है, तो भारत अमेरिका और चीन के बाद उन चुनिंदा देशों में शामिल होगा, जहां निजी कंपनियां स्वतंत्र रूप से ऑर्बिटल लॉन्च करने में सक्षम हैं। इससे भारत का स्पेस इकोसिस्टम मजबूत होगा, विदेशी ग्राहकों को आकर्षित करने का रास्ता खुलेगा और छोटे सैटेलाइट लॉन्च का वैश्विक बाजार भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर लेकर आएगा। खेती, मौसम पूर्वानुमान, संचार, इंटरनेट, आपदा प्रबंधन, नेविगेशन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी तेज और सस्ते सैटेलाइट लॉन्च का सीधा लाभ मिल सकता है।

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