30 लाख की नौकरी छोड़ने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया। उसने फर्जी ट्रेडिंग ऐप से सैकड़ों निवेशकों से करीब 100 करोड़ रुपये ठगे। इस ऑनलाइन रैकेट के मास्टरमाइंड समेत 3 लोग पकड़े गए हैं।

दिल्ली पुलिस ने एक 31 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर को गिरफ्तार किया है, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में करीब 30 लाख रुपये सालाना कमाता था। पुलिस का कहना है कि उसने इतनी अच्छी नौकरी छोड़कर पूरे भारत में सैकड़ों निवेशकों को ठगने वाला एक फर्जी ऑनलाइन ट्रेडिंग रैकेट चलाना शुरू कर दिया। आरोपी की पहचान रवि राठौर के तौर पर हुई है, जिसे इस पूरे फ्रॉड का मास्टरमाइंड माना जा रहा है। पुलिस ने कर्नाटक और मध्य प्रदेश तक चले एक बड़े ऑपरेशन के बाद रवि को उसके दो साथियों के साथ गिरफ्तार किया है।

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कैसे होता था ये फ्रॉड?

दिल्ली पुलिस ने बताया कि आरोपियों ने एक नकली मोबाइल एप्लीकेशन और एक फर्जी वेबसाइट बनाई थी। इस प्लेटफॉर्म को एक ऑनलाइन ट्रेडिंग सर्विस की तरह पेश किया गया था। पीड़ितों से बिना किसी जोखिम के तगड़े रिटर्न का वादा किया जाता था। यह गैंग मुख्य रूप से उन लोगों को निशाना बनाता था जो शेयर बाजार में पैसा लगाने में दिलचस्पी रखते थे। वे निवेशकों को बताते थे कि उनका सिस्टम एडवांस सॉफ्टवेयर टूल्स का इस्तेमाल करता है, जो सुरक्षित तरीके से बड़ा मुनाफा कमा सकता है। पुलिस ने कहा कि इस ग्रुप ने लोगों का भरोसा जीतने और उन्हें पैसा लगाने के लिए राजी करने के लिए बहुत convincing तरीके अपनाए।

एक शिकायत से शुरू हुई जांच

यह मामला तब सामने आया जब दिल्ली के पहाड़गंज इलाके के एक निवासी ने नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायतकर्ता ने बताया कि अनजान नंबरों से आए फोन कॉल्स पर उन्हें यह ट्रेडिंग ऐप डाउनलोड करने और निवेश शुरू करने के लिए मनाया गया। उनके दावों पर भरोसा करके, पीड़ित ने कई ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के जरिए 10,000 रुपये ट्रांसफर कर दिए। शुरुआत में, ऐप पर भरोसा बनाने के लिए नकली डेली प्रॉफिट दिखाया जाता था। यह डिस्प्ले बिल्कुल असली जैसा दिखने के लिए डिजाइन किया गया था ताकि लोग और पैसा जमा करें।

और पैसे की मांग होने लगी

जब पीड़ित ने अपने पैसे निकालने की कोशिश की, तो ऑपरेटरों ने कथित तौर पर उससे और पैसे जमा करने को कहा। डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस रोहित राजवीर सिंह ने बताया कि जब भी पीड़ित पैसे निकालने की कोशिश करता, तो उससे अतिरिक्त रकम चुकाने को कहा जाता था। इसके लिए टैक्स, अकाउंट एक्टिवेशन फीस और प्रोसेसिंग चार्ज जैसे बहाने बनाए जाते थे। इन बार-बार की मांगों से पीड़ित को शक हुआ। साइबर फ्रॉड के बारे में सरकारी चेतावनियां पढ़ने के बाद, उसे एहसास हुआ कि उसके साथ धोखा हुआ है और उसने अधिकारियों को मामले की सूचना दी।

FIR और जांच

1 मई को FIR दर्ज की गई। इसके बाद, दिल्ली पुलिस ने एक विस्तृत जांच शुरू की। जांच में टेक्निकल सर्विलांस, आईपी एड्रेस ट्रैकिंग, सर्वर लॉग एनालिसिस और फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन की जांच शामिल थी। जांचकर्ताओं ने पाया कि नकली ऐप का बैकएंड सिस्टम और कंट्रोल पैनल बेंगलुरु से ऑपरेट किया जा रहा था। वहीं, कॉलिंग ऑपरेशंस और पैसों का लेन-देन मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के सनावद से जुड़ा था। पुलिस ने दोनों राज्यों में संदिग्धों को पकड़ने के लिए दो अलग-अलग टीमें बनाईं।

गिरफ्तारी और बरामदगी

रवि राठौर को 3 मई को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने उसके पास से दो लैपटॉप, एक मोबाइल फोन और एक SUV बरामद की, जो कथित तौर पर धोखाधड़ी के पैसे से खरीदी गई थी। 5 मई को, दूसरी टीम ने उसके साथियों सुदामा और विकाश राठौड़ को सनावद से गिरफ्तार किया। पुलिस ने जिसे कॉल सेंटर बताया, वहां छापेमारी के दौरान 17 मोबाइल फोन, पांच कंप्यूटर, 13 सिम कार्ड, बैंक खाते के रिकॉर्ड, एटीएम कार्ड और बड़ी मात्रा में डिजिटल डेटा जब्त किया। इस डेटा में हजारों संभावित पीड़ितों की डीटेल्स थीं।

पीड़ितों को कैसे निशाना बनाया जाता था

जांचकर्ताओं ने बताया कि ग्रुप ने पीड़ितों से संपर्क करने के लिए महिला कॉलर्स को काम पर रखा था। इसका मकसद पुरुष निवेशकों का भरोसा जीतना और उन्हें ज्यादा पैसा लगाने के लिए प्रोत्साहित करना था। पुलिस का मानना है कि इस रणनीति ने ग्रुप को लोगों को बड़ी रकम निवेश करने के लिए मनाने में मदद की।

किस आरोपी की क्या भूमिका थी

पुलिस ने बताया कि राठौर ने अपने सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के बैकग्राउंड का इस्तेमाल फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म बनाने और उसे मेंटेन करने के लिए किया। सुदामा कथित तौर पर ऑपरेशंस के लिए पैसा लगाता था। वहीं, विकाश कॉल संभालता था और इस स्कीम को बढ़ावा देने के लिए निवेशकों से बातचीत करता था।

धोखाधड़ी का पैमाना

टेक्निकल एनालिसिस से पता चला कि प्लेटफॉर्म पर 636 विक्टिम अकाउंट बनाए गए थे। पुलिस को इस रैकेट से जुड़े करीब 14,232 ट्रांजैक्शन मिले। इसमें शामिल कुल रकम करीब 99.77 करोड़ रुपये थी। अधिकारियों ने कहा कि इस पैसे का एक हिस्सा इंदौर में फ्लैट और अन्य संपत्तियां खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया था। लग्जरी गाड़ियां भी खरीदी गईं।

नेटवर्क और भी बड़ा हो सकता है

जांचकर्ताओं को शक है कि आरोपी दूसरे राज्यों में हुए इसी तरह के धोखाधड़ी के मामलों से भी जुड़े हो सकते हैं। पुलिस अब पूरे मनी ट्रेल का पता लगा रही है। वे उन म्यूल अकाउंट्स की भी जांच कर रहे हैं जिनका इस्तेमाल फंड ट्रांसफर करने के लिए किया गया था और अन्य पीड़ितों की पहचान कर रहे हैं। 

यह मामला दिखाता है कि कैसे ऑनलाइन धोखाधड़ी असली और भरोसेमंद लग सकती है। पुलिस की कार्रवाई ने एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसने कथित तौर पर निवेशकों को ठगने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया। जांच अभी भी जारी है। अधिकारियों का कहना है कि जैसे-जैसे वे फाइनेंशियल रिकॉर्ड और डिजिटल सबूतों को ट्रैक करना जारी रखेंगे, और भी जानकारी सामने आ सकती है। ये गिरफ्तारियां इस रैकेट को रोकने और भविष्य के निवेशकों की सुरक्षा में एक बड़ा कदम हैं।