Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने आरोप लगाया कि अमीरों ने न्याय व्यवस्था हाईजैक कर लिया है। उन्होंने पूर्व CJI पर भी सवाल उठाए हैं।
Supreme Court Controversy: देश की सबसे बड़ी अदालत और न्याय व्यवस्था को लेकर सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। 48 सालों से वकालत कर रहे दवे ने आरोप लगाया है कि देश की न्याय व्यवस्था पर अमीर और रसूखदार लोगों ने कब्जा कर लिया है। 17वें केएम बशीर मेमोरियल लेक्चर के दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कामकाज, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के फैसलों और अदालतों में आम इंसान की घटती अहमियत पर खुलकर अपनी भड़ास निकाली।
'इतने भ्रष्ट जज रहे कि गिनती भूल चुका हूं'
दुष्यंत दवे ने अपने लंबे करियर का हवाला देते हुए कहा कि अदालत में कई शानदार और ईमानदार जज रहे हैं, लेकिन भ्रष्ट जजों की तादाद भी कम नहीं रही। उन्होंने कहा, 'मैंने 48 साल तक वकालत की है। सुप्रीम कोर्ट में इतने भ्रष्ट जज रहे हैं कि अब मुझे उनकी गिनती तक याद नहीं। उनके फैसलों ने पूरे सिस्टम और आम आदमी के भरोसे को बहुत गहरी चोट पहुंचाई है।' उन्होंने कहा कि न्याय कोई एहसान नहीं, बल्कि इंसान की बुनियादी जरूरत है। जब न्यायपालिका ही निष्पक्ष न रहे, तो सबसे ज्यादा नुकसान देश के आम नागरिक का होता है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ पर तंज
लाइव लॉ के मुताबिक, दवे ने अपने भाषण में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के फैसलों और उनकी कार्यशैली पर भी तीखा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा, 'जस्टिस चंद्रचूड़ खुद को बहुत बड़ा लिबरल (उदारवादी) और महान मानते थे, लेकिन उनके दौर में सुप्रीम कोर्ट में 17 जजों की नियुक्ति हुई और उनमें एक भी महिला को जगह नहीं मिली।' उन्होंने कहा कि 'देश की अदालतों में ज्यादातर जज खास वर्गों और पुराने कानूनी परिवारों से आते हैं। जब तक समाज के हर तबके और महिलाओं को जज की कुर्सी पर बैठने का मौका नहीं मिलेगा, तब तक अदालतें आम लोगों के दुख-दर्द और संवेदनशीलता को कभी नहीं समझ पाएंगी।'
'अमीरों की सुनवाई तुरंत, कॉरपोरेट्स कभी केस नहीं हारते'
दवे ने सर्वोच्च न्यायालय पर बड़ा आरोप लगातु हे कहा कि 'आज का कानूनी ढांचा सिर्फ पैसे वालों के लिए काम कर रहा है। अगर कोई बड़ा उद्योगपति या अमीर व्यक्ति कोर्ट पहुंचता है, तो उसके केस की तारीख तुरंत लग जाती है और सुनवाई भी तेजी से होती है, जबकि आम इंसान सालों-साल तारीख के चक्कर काटता रहता है।' उन्होंने कहा कि 'आप कोई भी बिजनेस अखबार उठा कर देख लीजिए। हर दूसरे या तीसरे दिन किसी न किसी बड़े कॉरपोरेट घराने के हक में फैसला आता है। यह हैरान करने वाली बात है कि बड़े कारोबारी कभी केस हारते ही नहीं।'
कार्यपालिका का झुकाव और नागरिकों के अधिकारों पर चिंता
वरिष्ठ वकील ने ये भी कहा कि 'सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करने की अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पा रहा है।' उन्होंने चुनाव आयोग और न्यायपालिका दोनों के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा दौर में युवाओं के वोट देने के हक से लेकर आम लोगों की आजादी तक खतरे में दिखती है। साथ ही उन्होंने अफसोस जताया कि आज के समय में न तो मीडिया और न ही अदालतें नागरिकों की ढाल बनकर खड़ी हो पा रही हैं।


