क्या TMC में 58 विधायकों की बगावत ने ममता बनर्जी की पकड़ को सबसे बड़ा झटका दे दिया? सिर्फ 8 विधायक ही बैठक में क्यों पहुंचे, क्या पार्टी अंदर से टूट चुकी है? क्या ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मानने से बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आएगा? कोर्ट की लड़ाई और सियासी टकराव के बीच TMC का भविष्य किस दिशा में जाएगा?

Trinamool Congress Split: पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा भूचाल आ गया है जिसने तीन दशक पुरानी सत्ताधारी पार्टी की नींव हिलाकर रख दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट आवास पर शुक्रवार को हुई इमरजेंसी मीटिंग ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचे उस घमासान को जगजाहिर कर दिया है, जिसे अब तक दबाने की कोशिश की जा रही थी। कभी राज्य की राजनीति में एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी के गढ़ में यह अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक संगठनात्मक फूट मानी जा रही है।

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सन्नाटे में कालीघाट: जब ममता की बैठक में खाली रह गईं कुर्सियां

चुनाव नतीजों में महज़ 80 सीटों पर सिमटने वाली TMC के जख्मों पर उस वक्त नमक छिड़क गया, जब ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई बेहद अहम बैठक में सन्नाटा पसर गया। 58 विधायकों की खुली बगावत के बीच इस बैठक में बागी गुट को छोड़कर सिर्फ आठ (8) विधायक ही शामिल हुए। ANI के अनुसार, बैठक में केवल बीना मंडल, अशिमा पात्रा, मदन मित्रा, कुणाल घोष, फिरहाद हकीम, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, बिमान बनर्जी और अशोक कुमार देब जैसे गिने-चुने वफादार ही नजर आए। हालांकि, बैठक में छह शीर्ष सांसद-अभिषेक बनर्जी, डेरेक ओ'ब्रायन, डोला सेन, माला रॉय, कल्याण बनर्जी और सुदीप बंद्योपाध्याय भी मौजूद थे, लेकिन विधायकों की यह नगण्य संख्या पार्टी के भीतर नेतृत्व के कम होते प्रभाव की ओर साफ इशारा कर रही है।

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बगावत का नया चेहरा: क्या 'असली TMC' छिन जाएगी?

इस तख्तापलट की कमान कभी CPI(M) के फायरब्रांड छात्र नेता रहे और बाद में TMC के जरिए राज्यसभा पहुंचने वाले ऋतब्रत बनर्जी ने संभाल ली है। ऋतब्रत ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) से मुलाकात की और इसके तुरंत बाद खुद को विधानसभा में आधिकारिक रूप से 'विपक्ष का नेता' (LoP) घोषित करवाकर सबको चौंका दिया। ऋतब्रत बनर्जी ने खुलेआम चुनौती देते हुए कहा, "TMC लेजिस्लेटिव पार्टी उन 58 विधायकों की टीम है जो पार्टी के सिंबल पर जीते थे। अब विधानसभा के भीतर हम ही असली TMC हैं और स्पीकर ने हमारे इस दावे को कानूनी मान्यता दे दी है।" इस बगावत में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ममता बनर्जी का मजबूत वोट बैंक माने जाने वाले मुस्लिम विधायकों में से करीब आधे (34 में से लगभग 17) अब ऋतब्रत के साथ खड़े हो गए हैं।

भतीजे से तकरार और 'मुख्य सलाहकार' का पेचीदा जाल

इस पूरे सियासी ड्रामे में सस्पेंस तब और गहरा गया जब बागी गुट ने ममता बनर्जी को पूरी तरह खारिज नहीं किया। बागियों ने एक बेहद शातिर चाल चलते हुए प्रस्ताव रखा है कि वे ममता बनर्जी को अपनी "मुख्य सलाहकार" बनाए रखने के लिए तैयार हैं। हालांकि, उनकी असली जंग ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ है। ऋतब्रत और उनके गुट ने साफ कर दिया है कि वे अभिषेक बनर्जी से किसी भी कीमत पर कोई बातचीत नहीं करेंगे। साल 2016 से पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले अभिषेक के खिलाफ विधायकों का यह गुस्सा अब टीएमसी को दो धड़ों में बांट चुका है।

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अदालत की दहलीज पर जंग: सड़कों से लेकर कोर्ट तक आर-पार

इस अप्रत्याशित झटके से तिलमिलाई ममता बनर्जी की कोर टीम अब कानूनी और राजनीतिक पलटवार की तैयारी में जुट गई है। बैठक खत्म होने के बाद पार्टी के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी ने मीडिया के सामने आकर स्पीकर के इस फैसले को पूरी तरह "गैर-कानूनी" और असंवैधानिक करार दिया। कल्याण बनर्जी ने एलान किया, "स्पीकर द्वारा विपक्ष के नेता की यह नियुक्ति पूरी तरह अवैध है। हम इसके खिलाफ सोमवार को हाई कोर्ट में याचिका दायर करने जा रहे हैं।" इसके साथ ही उन्होंने केंद्र की सत्ताधारी दल पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी कार्यकर्ता जानबूझकर टीएमसी नेताओं को झूठे मुकदमों में फंसा रहे हैं। कालीघाट से निकले इस संदेश ने साफ कर दिया है कि बंगाल की यह जंग अब सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह सड़कों से लेकर अदालत के कमरों तक लड़ी जाएगी। बंगाली सियासत का यह सस्पेंस अब हर गुजरते घंटे के साथ और अधिक गहरा होता जा रहा है।