Trump Saudi Nuclear Deal: डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक अहम सिविल न्यूक्लियर डील कांग्रेस को भेजी है. लेकिन इसके साथ एक शर्त जुड़ी है- रियाद को इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने होंगे. इस डील से सऊदी को यूरेनियम संवर्धन की इजाजत मिल सकती है, जिससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ पर बहस छिड़ गई है.

Saudi Arabia Nuclear Deal: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक बड़ी सिविल न्यूक्लियर डील अमेरिकी कांग्रेस के पास समीक्षा के लिए भेजी है. द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने साफ कर दिया है कि यह डील तभी आगे बढ़ेगी जब सऊदी अरब, इजरायल के साथ अपने रिश्ते सामान्य करेगा.

यह समझौता 30 साल के लिए है. इस पर अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान ने दस्तखत किए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इस डील पर अमेरिकी सांसदों के बीच महीनों तक बहस चलने की उम्मीद है. बहस इस बात पर होगी कि अमेरिका की न्यूक्लियर इंडस्ट्री को कैसे बढ़ाया जाए और साथ ही पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों के प्रसार को कैसे रोका जाए.

डील के लिए 'अब्राहम अकॉर्ड' की शर्त

द वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, इस समझौते से अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब का न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में अहम भूमिका मिलेगी. साथ ही, सऊदी को अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) का रास्ता भी मिल सकता है. ट्रंप ने पहले भी इस न्यूक्लियर डील को 'अब्राहम अकॉर्ड' से जोड़ा था. यह अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ एक समझौता है, जिसके तहत इजरायल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक रिश्ते बने थे.

ट्रंप ने 23 जुलाई को अपने 'ट्रुथ सोशल' पोस्ट में कहा था कि यह न्यूक्लियर समझौता सिर्फ गैर-सैन्य कामों के लिए होगा. उन्होंने यह भी साफ किया था कि इस व्यवस्था के तहत घरेलू यूरेनियम संवर्धन की इजाजत नहीं होगी. ट्रंप ने लिखा, "सिविल न्यूक्लियर डील... को मंजूरी मिल जाएगी, लेकिन यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर है कि सऊदी अरब बेहद सम्मानित और सफल 'अब्राहम अकॉर्ड' में शामिल हो." उन्होंने यह भी जोड़ा, "अमेरिका सिविल (गैर-संवर्धित) न्यूक्लियर सुविधाओं के खिलाफ नहीं है."

राजनयिक मुश्किलें और सऊदी का रुख

इस न्यूक्लियर डील को इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने से जोड़कर ट्रंप ने इसे पश्चिम एशिया की कूटनीति के एक पुराने मुद्दे से बांध दिया है. सऊदी अरब बार-बार कहता आया है कि वह इजरायल को तभी राजनयिक मान्यता देगा, जब एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के लिए एक साफ और भरोसेमंद रास्ता तैयार हो.

द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की 'अब्राहम अकॉर्ड' को विस्तार देने की कोशिशों के बावजूद, सऊदी अधिकारियों ने फिलिस्तीनी राज्य को लेकर अपना रुख नहीं बदला है. वॉशिंगटन और रियाद के बीच द्विपक्षीय सिविल न्यूक्लियर फ्रेमवर्क पर बातचीत कई अमेरिकी प्रशासनों से चली आ रही है, लेकिन पहले की कोशिशें परमाणु अप्रसार की शर्तों को लेकर अटक जाती थीं.

समझौते की खास बातें और कांग्रेसनल रिव्यू

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के समय के प्रस्तावों के उलट, मौजूदा ड्राफ्ट में सऊदी अरब के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के 'एडिशनल प्रोटोकॉल' पर साइन करना जरूरी नहीं है. यह प्रोटोकॉल जांचकर्ताओं को बिना बताए किसी भी साइट पर कम समय के नोटिस पर जांच का अधिकार देता है. व्हाइट हाउस का कहना है कि यह समझौता अमेरिका के 'एटॉमिक एनर्जी एक्ट' के मुताबिक है और इसमें परमाणु अप्रसार के लिए कड़े सुरक्षा उपाय हैं.

सऊदी अधिकारियों ने भी कहा है कि यह समझौता देश की ऊर्जा जरूरतों में विविधता लाने में मदद करेगा और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का भी पालन करेगा. यह द्विपक्षीय संधि एक "123 एग्रीमेंट" के तौर पर तैयार की गई है. इसके तहत सऊदी अरब में अमेरिकी टेक्नोलॉजी वाले AP1000 न्यूक्लियर रिएक्टर बनाए जाएंगे. अब यह समझौता कांग्रेस में 90 कामकाजी दिनों की समीक्षा अवधि के लिए रखा गया है. अगर सांसद इसे ब्लॉक नहीं करते हैं, तो यह अपने आप लागू हो जाएगा.

परमाणु प्रसार के खतरे पर आलोचना

कई डेमोक्रेटिक सांसदों ने इस समझौते की आलोचना की है. उन्होंने चेतावनी दी है कि सऊदी अरब को एडवांस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी देने से इस क्षेत्र में परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ सकती है.

क्या है 'अब्राहम अकॉर्ड'?

'अब्राहम अकॉर्ड' 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में शुरू हुआ था. इसके तहत इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे कई अरब देशों के बीच औपचारिक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध स्थापित हुए थे.