Unnao Man Performed His Own Terahvi Alive: उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक व्यक्ति ने जीते जी अपनी तेरहवीं और पिंडदान करवा दिया। गांव में भोज कराया गया और वजह सुनकर हर कोई हैरान रह गया। जानिए आखिर क्यों 56 वर्षीय रवींद्र प्रसाद ने अपने ही श्राद्ध कर्म का आयोजन किया।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे इलाके को हैरानी में डाल दिया। यहां एक शख्स ने न सिर्फ जीते जी अपनी तेरहवीं करवाई, बल्कि विधि-विधान से पिंडदान और पूरे गांव को भोज भी कराया। इस अनोखी घटना की चर्चा अब गांव की गलियों से निकलकर सोशल मीडिया तक पहुंच गई है। इस पूरे मामले के पीछे की वजह और भी ज्यादा चौंकाने वाली है। अधेड़ उम्र के इस व्यक्ति का कहना है कि वह जिंदगी में किसी का कर्ज या एहसान लेकर नहीं जाना चाहता। इसी सोच के चलते उसने अपने जीवित रहते ही अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्में पूरी करा दीं।

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उन्नाव के पीथनहार गांव का है मामला

यह अनोखा मामला उन्नाव जिले के फतेहपुर चौरासी थाना क्षेत्र के पीथनहार गांव का बताया जा रहा है। गांव के रहने वाले 56 वर्षीय रवींद्र प्रसाद ने 8 मई को पूरे गांव में अपनी ही तेरहवीं का निमंत्रण भेज दिया। जब लोगों ने शोक संदेश कार्ड देखा तो पहले किसी को यकीन ही नहीं हुआ। कार्ड में बाकायदा तेरहवीं भोज और पिंडदान कार्यक्रम का जिक्र किया गया था। गांव के लोग हैरान थे कि जिस व्यक्ति की तेरहवीं का निमंत्रण दिया जा रहा है, वह खुद लोगों को बुला रहा है।

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पंडित बुलाकर कराया गया श्राद्ध कर्म

9 मई को गांव में पूरे रीति-रिवाज और धार्मिक विधानों के साथ श्राद्ध कर्म कराया गया। पंडितों को बुलाया गया, पूजा-पाठ हुआ और पिंडदान की रस्म भी निभाई गई। इसके बाद गांव वालों के लिए भोज का आयोजन किया गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक, ऐसा दृश्य उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। लोग इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चा करते नजर आए।

परिवार से 40 साल से अलग रह रहे हैं रवींद्र

बताया जा रहा है कि रवींद्र प्रसाद लंबे समय से अपने परिवार से अलग रह रहे हैं। उन्होंने शादी भी नहीं की है और पिछले करीब 40 वर्षों से अकेले जीवन बिता रहे हैं। रवींद्र का कहना है कि जिंदगी में उन्होंने किसी पर बोझ नहीं बनना चाहा। यही वजह है कि उन्होंने अपने अंतिम संस्कार से जुड़ी जिम्मेदारियां भी खुद ही निभाने का फैसला किया।

“मरने के बाद किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता”

रवींद्र प्रसाद ने कहा कि उन्होंने यह फैसला पूरी सोच-समझ के बाद लिया है। उनके मुताबिक, “मैंने जीते जी अपनी तेरहवीं इसलिए करवाई ताकि मरने के बाद किसी पर मेरा कोई कर्ज या एहसान न रहे। मैं 40 साल से परिवार से दूर हूं। चाहता हूं कि मेरी वजह से किसी को परेशानी न उठानी पड़े।” उनकी यह बात सुनकर गांव के कई लोग भावुक भी नजर आए, जबकि कुछ लोग इसे बेहद अनोखा और हैरान करने वाला कदम बता रहे हैं।

सोशल मीडिया पर भी चर्चा में मामला

जिंदा रहते खुद का पिंडदान और तेरहवीं कराने की यह घटना अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। लोग इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछ लोग इसे आत्मनिर्भरता और वैराग्य से जोड़कर देख रहे हैं, तो कुछ इसे समाज और परिवार से टूटते रिश्तों की तस्वीर बता रहे हैं। हालांकि गांव में यह मामला फिलहाल चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। कई लोग सिर्फ इस अनोखे किस्से को सुनने और समझने के लिए रवींद्र प्रसाद से मिलने भी पहुंच रहे हैं।

क्यों खास बन गई यह घटना?

भारतीय परंपरा में तेरहवीं और पिंडदान जैसी रस्में मृत्यु के बाद परिजनों द्वारा कराई जाती हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति द्वारा खुद अपने जीवित रहते इन रस्मों को पूरा कराना बेहद दुर्लभ माना जाता है। उन्नाव की यह घटना सिर्फ एक अजीब खबर नहीं, बल्कि अकेलेपन, सामाजिक रिश्तों और इंसान की मानसिक स्थिति से जुड़े कई सवाल भी खड़े करती है।

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