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15 साल में शादी, 16 में तलाक-हलाला और बहुत कुछ: दादा DSP, पिता वकील फिर भी...एक टॉपर का दर्द
Muslim Women Right: क्या हलाला प्रथा महिलाओं के अधिकारों के लिए खतरा है? यूपी FIR ने दिखाया कि ट्रिपल तलाक के बाद महिलाएं झूठे हलाला दबाव और यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाएं कानूनी ग्रे एरिया उजागर करती हैं।

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक महिला की कहानी ने ट्रिपल तलाक और हलाला की कानूनी अस्पष्टताओं को उजागर किया है। जिसके दादा DSP, पिता वकील और खुद अलीगढ़ के स्कूल की टॉपर छात्रा रही हो, वो महिला, इंस्टेंट ट्रिपल तलाक और ज़बरदस्ती हलाला की प्रथा के कारण वर्षों तक मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलती रही। पति, देवर और मौलवियों के दबाव और धमकियों से गुजरते हुए, पीड़ित महिला ने अपनी बेटी और खुद की सुरक्षा के लिए संघर्षरत है। पढ़िए इस दिल दहलाने वाली कहानी और इसके खतरनाक पहलू, जिस पर न तो पुलिस का ध्यान गया और न ही कानून का।
Halala का दबाव: क्या यह महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है?
हलाला एक ऐसी प्रथा है जिसमें तलाक़ के बाद महिला को फिर से उसी पति से शादी करने के लिए, किसी और पुरुष के साथ शादी करनी पड़ती है। अमरोहा की ज़ुबैदा (बदला हुआ नाम) की शिकायत में बताया गया कि उसे बार-बार ज़बरदस्ती सुलह के लिए फंसाया गया। पुलिस के मुताबिक़, यह मामला 2019 के मुस्लिम महिला अधिनियम (Protection of Rights on Marriage) Act के तहत दर्ज किया गया, लेकिन केवल ट्रिपल तलाक को अपराध मानता है, लेकिन हलाला पर कोई कानूनी स्पष्टता नहीं है।
क्या और कहां का है पूरा प्रकरण?
यूपी के अमरोहा जिले की रहने वाली जुबैदा खातून (नाम परिवर्तित) ने सैद नगली थाने की पुलिस को बताया कि उसकी शादी जब वह केवल 15 साल की थी, तब ज़बरदस्ती कराई गई थी। उसे दो बार इंस्टेंट ट्रिपल तलाक दिया गया-एक बार 2016 में, और फिर 2021 में, जिसके बाद हलाला के ज़रिए तीन बार ज़बरदस्ती सुलह की कोशिशें की गईं। यह प्रक्रिया कई बार दोहराई गई, जिसमें महिला को ऐसे पुरुष के साथ संबंध बनाने को मजबूर किया गया, ताकि पूर्व पति के साथ फिर से शादी संभव हो सके। इस प्रथा के तहत उसे "बिचौलियों" के जरिए यौन उत्पीड़न भी झेलना पड़ा।
काैन है पीड़िता, क्या है फैमिली बैकग्राउंड?
पुलिस के सामने अपनी पीड़ा बयां करते हुए जुबैदा ने बताया कि "मुझे ऐसा लगता था जैसे मुझे हर बार किसी और को सौंपा जा रहा है। मेरे साथ जो हुआ, उसे बताने में मुझे बहुत शर्म आती थी। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी बेटी इसके बारे में पढ़कर बड़ी हो,"। अलीगढ़ के एक टॉप स्कूल की पूर्व छात्रा रही ज़ुबैदा एक ऐसे परिवार से आती हैं जिसका पब्लिक सर्विस में इतिहास रहा है-उनके दादा यूपी पुलिस में DSP थे और उनके पिता एक वकील हैं।
क्या कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ में है ग्रे ज़ोन?
विशेषज्ञ कहते हैं कि हलाला और बाल विवाह जैसी प्रथाएं कानून में अस्पष्टता के कारण बनी हुई हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ में शादी की न्यूनतम उम्र प्यूबर्टी से जोड़ी गई है, जबकि अधिकांश राज्यों में उम्र तय है। इस वजह से कई मामले अलग-अलग अदालतों में अलग तरह से हल होते हैं। लखनऊ की एक्टिविस्ट नैश हसन ने कहा, "अक्सर निकाह बिना दस्तावेज़ के होते हैं, इसलिए सबूत जुटाना महिलाओं के लिए बेहद मुश्किल है। गरीब और हाशिए पर पड़ी महिलाएं इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा पीड़ित होती हैं।"
क्या महिलाएं हिम्मत कर सकती हैं आवाज़ उठाने की?
सामाजिक दबाव, बदनामी का डर और आर्थिक निर्भरता अक्सर महिलाओं को चुप कर देते हैं। ज़किया सोमन, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक, कहती हैं, "हलाला जैसी प्रथाएं चुप्पी और पितृसत्तात्मक नियंत्रण से चल रही हैं। किसी महिला का आगे आना असाधारण हिम्मत मांगता है।"
क्या अब भी हलाला और इंस्टेंट तलाक़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लंबित हैं?
जी हां। ऐसे मामले अभी भी कानूनी चुनौती और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के इंतजार में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मुश्किल यह है कि बिना कागज़ी सबूत के महिलाएं अकेले सबूत साबित करें, और यही वजह है कि हलाला जैसी प्रथाएं आज भी अंडरग्राउंड में चलती हैं।
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