अमेरिका और ईरान हमले रोकने पर सहमत हो गए हैं। मंगलवार को दोहा में होर्मुज जलडमरूमध्य विवाद और परमाणु मुद्दे पर अहम वार्ता होगी। 60 दिन के संघर्ष-विराम की सफलता पर दुनिया की नजर है।
दोहा/वाशिंगटन: मिडिल ईस्ट में तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडराने के बीच एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। अमेरिका और ईरान, जो कुछ घंटे पहले तक एक-दूसरे पर मिसाइलें दाग रहे थे, अचानक अपने कदम पीछे खींचने पर सहमत हो गए हैं। एक्सियोस (Axios) की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, दोनों महाशक्तियां एक-दूसरे पर सैन्य हमले (काइनेटिक एक्टिविटी) रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के विवाद को सुलझाने के लिए मंगलवार को कतर की राजधानी दोहा में एक गुप्त और बेहद महत्वपूर्ण बैठक करने जा रही हैं।

हमले थमे, लेकिन क्या सचमुच खत्म हुआ टकराव?
अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य हमलों को फिलहाल रोकने पर सहमति जताई है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब कुछ ही दिन पहले हुए संघर्ष-विराम के बाद दोनों देशों के बीच तनाव फिर बढ़ने लगा था। अब दोनों प्रतिनिधिमंडल मंगलवार को कतर की राजधानी दोहा में आमने-सामने बैठेंगे, जहां सबसे अहम मुद्दा होगा-होर्मुज जलडमरूमध्य और क्षेत्रीय सुरक्षा। हालांकि यह सहमति राहत की खबर मानी जा रही है, लेकिन दोनों देशों के बयानों से साफ है कि मतभेद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। यही वजह है कि यह बैठक केवल एक कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता की परीक्षा बन गई है।
महज 11 दिन में टूटा भरोसा, ट्रंप की वो आखिरी चेतावनी!
इस डिप्लोमैटिक ड्रामे के पीछे की कहानी बेहद खौफनाक है। दोनों देशों के बीच हुए संघर्ष-विराम (ceasefire) को अभी केवल 11 दिन ही बीते थे कि अचानक दोनों तरफ से फिर से घातक हमले शुरू हो गए। इस सीजफायर के टूटने से पूरी दुनिया सहम गई थी। हालात इस कदर बिगड़ चुके थे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संघर्ष को पूरी तरह से दोबारा शुरू करने की खुली धमकी दे दी थी और "काम पूरा करने" का संकल्प लिया था। लेकिन इस विनाशकारी युद्ध के शुरू होने से ठीक पहले, दोनों देशों के अधिकारियों ने बैकचैनल बातचीत कर फिलहाल पीछे हटने (स्टैंडडाउन) का फैसला किया है।
स्विट्जरलैंड से दोहा: क्यों बदलना पड़ा बातचीत का 'सीक्रेट एजेंडा'?
सबसे बड़ा सस्पेंस: मंगलवार को होने वाली यह हाई-स्टेक बैठक असल में स्विट्जरलैंड में होने वाली थी, और इसका मुख्य मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम था। लेकिन पिछले कुछ दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य में जो कुछ भी हुआ, उसने पूरी बाजी पलट दी। अचानक बैठक की जगह बदलकर कतर कर दी गई और अब परमाणु मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालकर केवल जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के विवाद को मुख्य एजेंडा बनाया गया है। इस तकनीकी बातचीत में अमेरिकी टीम की कमान निक स्टीवर्ट संभालने वाले हैं।
हॉटलाइन का वो रहस्य और टोल टैक्स का नया खेल
इस पूरे विवाद की जड़ में 'समझौता ज्ञापन' (MOU) की वो व्याख्या है, जिसने मूल रूप से युद्ध को समाप्त किया था। पिछले हफ्ते स्विट्जरलैंड में वाइस प्रेसिडेंट वेंस के नेतृत्व में अमेरिकी सेना और ईरान की खूंखार सेना IRGC के बीच एक सीधी 'हॉटलाइन' स्थापित करने की बात तय हुई थी, ताकि जहाजों की आवाजाही पर नजर रखी जा सके। लेकिन शनिवार तक वह हॉटलाइन शुरू नहीं हो सकी। इसी बीच ईरान ने एक नया दांव खेल दिया है। ईरान का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर केवल उसका और ओमान का नियंत्रण होना चाहिए, और वहां से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल जहाजों से 'टोल टैक्स' या शुल्क लिया जाना चाहिए।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया ब्लैकआउट का खतरा
अगर ईरान इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने या उन्हें रोकने में कामयाब हो जाता है, तो पूरी दुनिया की समुद्री अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से इसे एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग माना जाता रहा है, जहां से दुनिया का सबसे ज्यादा कच्चा तेल गुजरता है। ईरान के इस कदम से वैश्विक तेल की कीमतों में आग लग सकती है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया है कि जब तक दोहा में यह तकनीकी बातचीत जारी रहेगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय जहाजों को बिना किसी रोक-टोक के सुरक्षित गुजरने दिया जाएगा। अब पूरी दुनिया की नजरें मंगलवार को दोहा में होने वाली इस टेबल-टॉक पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि दुनिया में शांति रहेगी या विनाशकारी युद्ध होगा।


