बंगाल में BJP सोमवार को UCC बिल पेश कर सकती है। विधानसभा में बहुमत होने से इसके पास होने की संभावना मजबूत है। बिल पर धर्म, आदिवासी अधिकार और पर्सनल लॉ को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की उम्मीद है।
West Bengal UCC Bill: कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में इस वक्त भारी सरगर्मी है। सूत्रों से मिली बेहद पुख्ता जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित भाजपा सरकार सोमवार को विधानसभा में अपना सबसे बड़ा और पहला तुरुप का इक्का चलने जा रही है। खबर है कि सुवेंदु अधिकारी सरकार सोमवार को ही राज्य का पहला और सबसे विवादास्पद बिल 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' (UCC) यानी समान नागरिक संहिता पेश कर सकती है। गुरुवार को हुई बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की हाई-लेवल बैठक में इस सीक्रेट एजेंडे पर गहन चर्चा हुई थी, जिसके बाद से ही विपक्ष के खेमे में हड़कंप मचा हुआ है।

बहुमत का प्रचंड आंकड़ा: क्या विपक्ष का विरोध रह जाएगा बेअसर?
इस बार बंगाल विधानसभा का समीकरण पूरी तरह बदल चुका है। 294 सदस्यों वाली इस विधानसभा में भाजपा के पास 207 विधायकों का प्रचंड बहुमत है। इस जादुई आंकड़े के दम पर सरकार इस बिल को बिना किसी रुकावट के आसानी से पास कराने की मजबूत स्थिति में है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह बिल राज्य में एक तीखी और ऐतिहासिक बहस को जन्म देगा, क्योंकि बंगाल की आबादी का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है। ऐसे में सदन से लेकर सड़क तक एक बड़े सियासी टकराव की उम्मीद जताई जा रही है।
ममता बनर्जी का वो वादा: क्या ध्वस्त होने जा रहा है पुराना किला?
यह वही यूनिफॉर्म सिविल कोड है, जिसका पिछली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार ने पुरजोर विरोध किया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जनता से यह कड़ा वादा किया था कि वे किसी भी कीमत पर UCC को बंगाल की धरती पर लागू नहीं होने देंगी। लेकिन, हालिया चुनावों में भाजपा ने भारी बहुमत से जीत दर्ज कर सत्ता की कमान संभाली और अब वे ममता बनर्जी के उस पुराने राजनीतिक वादे और किले को ध्वस्त करने के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।
शाह की वो 'डेडलाइन': छह महीने के भीतर वादे को पूरा करने की जिद!
जब बंगाल चुनावों से पहले भाजपा ने अपना घोषणापत्र जारी किया था, तब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा और साहसिक वादा किया था। उन्होंने साफ कहा था कि भाजपा के सत्ता में आने के छह महीने के भीतर ही बंगाल में UCC लागू कर दिया जाएगा। अब सरकार अपने इसी प्रमुख चुनावी वादे को रिकॉर्ड समय में पूरा करने की जिद पर अड़ी है। अगर यह बिल सोमवार को पास हो जाता है, तो उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद पश्चिम बंगाल देश का चौथा राज्य बन जाएगा, जहाँ नागरिक कानून सबके लिए समान होगा।
प्रथाओं पर प्रहार या अधिकारों की जंग: क्यों खड़ा हुआ है नया विवाद?
यह नया कानून लागू होते ही शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने और उत्तराधिकार से जुड़े तमाम धर्म-आधारित पर्सनल लॉ (व्यक्तिगत कानूनों) को हमेशा के लिए खत्म कर देगा और सभी नागरिकों को एक समान दर्जा देगा। विशेष रूप से, यह कानून उन प्रथाओं पर रोक लगाएगा जिनका पालन मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों में महिला के पति की मृत्यु या तलाक के बाद किया जाता है (जैसे निकाह हलाला और इद्दत)। यही वजह है कि यह कानून लगातार धार्मिक और राजनीतिक विवादों के केंद्र में बना हुआ है।
आदिवासियों को छूट: क्या 'समानता' के मूल सिद्धांत पर उठ रहे हैं सवाल?
UCC को लेकर एक और बड़ा सस्पेंस आदिवासी अधिकारों को लेकर बना हुआ है। अमित शाह ने पहले ही यह भरोसा दिलाया था कि सभी आदिवासी समुदायों को इस प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रखा जाएगा। लेकिन, इसी छूट ने एक नई बहस को हवा दे दी है। असम के धार्मिक नेताओं और विश्लेषकों का तर्क है कि यदि किसी समुदाय को इससे बाहर रखा जाता है, तो यह 'सच्चे' UCC की परिभाषा पर खरा नहीं उतरता; क्योंकि समान नागरिक संहिता का मतलब ही है देश के हर नागरिक पर एक जैसा कानून लागू होना। इस छूट के कारण अब मध्य प्रदेश जैसे बड़ी आदिवासी आबादी वाले राज्यों में भी एक नया वैचारिक युद्ध छिड़ गया है। अब देखना यह है कि सोमवार को बंगाल विधानसभा में जब यह बिल पटल पर रखा जाएगा, तो क्या नया इतिहास रचेगा?


