Bahuda Rath Yatra 2026: 23 या 24 जुलाई, कब निकलेगी भगवान जगन्नाथ की बहुड़ा यात्रा?
Bahuda Yatra 2026 Date: भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है। इसे देखने देश ही नहीं विदेश से भी लाखों भक्त यहां आते हैं।

जानें बहुड़ा यात्रा से जुड़ी रोचक बातें
Kab Hai Bahuda Yatra: ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर हिंदुओं के प्रमुख चार धामों में से भी एक है। आषाढ़ मास में यहां हर साल रथयात्रा का आयोजन किया जाता है जिसमें भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा को रथ में बैठाकर नगर भ्रमण करवाया जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ 8 दिन अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर में रुकते हैं। भगवान जगन्नाथ की यात्रा जब लौटती है तो इसे बहुड़ा यात्रा कहते हैं। धर्म ग्रंथों में इसका भी विशेष महत्व बताया गया है। जानें इस बार कब है बहुड़ा यात्रा…

कब निकलती है बहुड़ा यात्रा?
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा मंदिर से शुरू होती है। इस बार ये रथयात्रा 16 जुलाई को निकाली जा चुकी है। इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जहां वे 8 दिन रूकते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी तिथि को अपने घर यानी मुख्य मंदिर की ओर लौटते हैं। भगवान जगन्नाथ की वापसी की इस यात्रा को ही बहुड़ा यात्रा कहते हैं।
कब है बहुड़ा यात्रा 2026?
इस बार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 23 जुलाई, गुरुवार की सुबह 7 बजकर 03 मिनिट से शुरू होगी जो अगले दिन यानी 25 जुलाई, शुक्रवार की सुबह 9 बजकर 13 मिनिट तक रहेगी। चूंकि दशमी तिथि का सूर्योदय 24 जुलाई को होगा, इसलिए इसी दिन बहुड़ा यात्रा निकाली जाएगी। इसी दिन भगवान जगन्नाथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथों में बैठकर अपने घर यानी मुख्य मंदिर की ओर यात्रा करेंगे। बहुड़ा यात्रा को कार वापसी उत्सव भी कहते हैं।
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बहुड़ा यात्रा के बाद क्या होता है?
बहुड़ा यात्रा के अगले दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को रथ पर ही सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। इस परंपरा को सुना बेशा या राजवेश कहा जाता है। लाखों श्रद्धालु इस दिव्य स्वरूप के दर्शन करते हैं। इसके बाद भगवान को विशेष पेय का भोग लगाते हैं जिसे अधर पाना कहते हैं। मान्यता है कि यह भोग रथों पर विराजमान अदृश्य देवताओं और गणों को समर्पित होता है।
क्या है रसगुल्ला दिवस?
सुना बेशा और अधर पाना की परंपरा के बाद भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ पुनः मंदिर में प्रवेश करते हैं। लेकिन इसके पहले वे देवी देवी लक्ष्मी को रसगुल्ला देकर प्रसन्न करते हैं। इस परंपरा को नीलाद्रि बीजे कहते हैं। देवी लक्ष्मी को रसगुल्ला भेंट करने के कारण इसे रसगुल्ला दिवस भी कहा जाता है।
Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।
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