Unique Temple: काशी देश के प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर हैं। ऐसा ही एक मंदिर है भगवान कालभैरव का। कालभैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। यहां विशेष मौकों पर भगवान कालभैरव का श्रृंगार पुलिस की वर्दी में किया जाता है।

Unique Temples Of India: काशी हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है। प्राचीन सप्तपुरियों में भी इसका नाम आता है। यहां भगवान शिव स्वयं विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हैं। काशी में भगवान कालभैरव का भी एक प्राचीन मंदिर है, जिससे कईं मान्यताएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं। कहते हैं काशी आने वाले को कालभैरव के दर्शन करना अनिवार्य है नहीं तो उसे काशी दर्शन का पूरा फल नहीं मिलता। यहां भगवान कालभैरव को खास मौकों पर पुलिस की वर्दी पहनाकर श्रृंगार किया जाता है। आगे जानिए ये परंपरा कैसे शुरू हुई और इस मंदिर का इतिहास…

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क्यों भगवान कालभैरव को पहनाते हैं पुलिस की वर्दी?

काशी का ये कालभैरव मंदिर बहुत ही प्राचीन है। यहां भगवान कालभैरव को पुलिस की वर्दी पहनाने की परंपरा ज्यादा पुरानी नहीं है। दरअसल कोरोना काल में जब पूरी दुनिया पर संकट आया तो मंदिर के पुजारियों ने भगवान कालभैरव को पुलिस की वर्दी पहनाकर शहर की रक्षा और इस महामारी से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। कुछ समय बाद कोरोना महामारी से देश-दुनिया को मुक्ति मिल गई। तभी से खास मौकों पर भगवान कालभैरव का पुलिस की वर्दी पहनाकर खास श्रृंगार किया जाता है, जिसे देखने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

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काशी का कालभैरव मंदिर क्यों है खास?

मान्यताओं के अनुसार, काशी के राजा भगवान शिव हैं। उन्होंने ही कालभैरव को कोतवाल यानी रक्षक के रूप में यहां स्थान दिया है। कालभैरव न सिर्फ इस शहर की रक्षा करते हैं बल्कि पापियों को दण्ड भी देते हैं। इस मंदिर का वर्णन स्कंद पुराण के अवंति खंड में भी मिलता है। वर्तमान में यहां जो मंदिर दिखाई देता है उसका निर्माण राजा भद्रसेन ने करवाया था। मराठा काल के दौरान महादजी शिंदे ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था।

कालभैरव को यहां मिली थी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति

शिवपुराण के अनुसार, एक बार ब्रह्मा स्वयं को सभी देवताओं में श्रेष्ठ बताने लगे। तब शिवजी के कहने पर कालभैरव ने उनका एक सिर काट दिया। वो सिर कालभैरव के हाथ पर चिपक गया। काफी प्रयासों के बाद भी जब वो सिर नहीं निकला तो कालभैरव काशी आए। यहां आकर ब्रह्मा का वो सिर कालभैरव के हाथ से अपने आप ही निकल गया। इस तरह काशी में कालभैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली। तभी से कालभैरव यहीं पर निवास कर रहे हैं।


Disclaimer
इस आर्टिकल में जो जानकारी है, वो धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गईं हैं। हम सिर्फ इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का एक माध्यम हैं। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।