Tilakund Chaturthi Vrat Katha: 22 जनवरी, गुरुवार को तिलकुंद चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। इससे जुड़ी एक कथा भी है जिसे सुनने के बाद ही इस व्रत का पूरा फल मिलता है। ये कथा बहुत ही रोचक भी है।

Tilakund Chaturthi Vrat Katha In Hindi: माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को तिलकुंद चतुर्थी कहते हैं। इस बार ये चतुर्थी 22 जनवरी, गुरुवार को है। इस व्रत का महत्व अनेक धर्म ग्रंथों में बताया गया है। इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा भी है जिसे सुनकर ही इस व्रत का पूरा फल मिलता है। आगे पढ़िए तिलकुंद चतुर्थी व्रत की रोचक कथा… 

तिलकुंद चतुर्थी की व्रत कथा

प्राचीन कथा के अनुसार, किसी समय कर्नाटक राज्य के भानुपुरी नाम की एक नगरी थी। वहां के राजा नाम सोम था। वे अपनी प्रजा का संतान की तरह प्रेम करते थे और नीतिपूर्वक शासन करते थे। एक बार उनके राज्य में काफी लंबे समय तक वर्षा नहीं हुई। चारों ओर अकाल छा गया।

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तब राजा सोम वन में रहने वाले शौनक मुनि के पास गए। शौनक मुनि भगवान श्रीगणेश के परम भक्त थे। शौनक मुनि ने राजा सोम के वन में आने का कारण पूछा। राजा सोम ने उन्हें पूरी बात सच-सच बता दी। राजा की बात सुनकर शौनक मुनि ने कहा कि ‘तुम्हारे राज्य में महापाप हुआ है, जिसके कारण वहां अनावृष्टि की स्थिति बनी है।’

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जब राजा सोम ने उस महापाप के बारे में पूछा तो शौनक मुनि ने कहा ‘तुम्हारे राज्य में कोई भी चतुर्थी व्रत नहीं करता जो प्रत्येक मास के दोनों पक्षों को की जाती है। ये व्रत भगवान श्रीगणेश को अतिप्रिय है। इस व्रत को करने से ही तुम्हारे राज्य में बारिश हो सकती है।’ राजा सोम को चतुर्थी व्रत की विधि और महत्व भी शौनक मुनि ने बताया।
इसके बाद शौनक मुनि ने एक मंत्र भी राजा सोम को कहा ‘तुम्हारे राज्य में सभी लोग अगर चतुर्थी तिथि का व्रत करें और ये मंत्र बोलें तो निश्चित रूप से तुम्हारी समस्या का समाधान होगा। शौनक मुनि ने मंत्र बताया ‘ गणानां त्वा गं हवामहे कवीं कवीनामुपश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मस्पत आ नः शृण्वत्रूतिभिः सीद सादनम्॥’
राजा सोम ने अपने राज्य में आकर पूरी प्रजा सहित माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का व्रत किया। ऐसा करने से उनके राज्य में बारिश होने लगी। इसके बाद उनके राज्य में कभी चतुर्थी तिथि का व्रत करने लगे। राजा सोम ने अपने राज्य ने भगवान श्रीगणेश के अनेक मंदिर भी बनवाएं। श्रीगणेश की कृपा से उनके राज्य में कोई भी दुखी नहीं था। सभी प्रेम के साथ रहते थे। इस तरह चतुर्थी व्रत करने से राजा सोम को गणेश लोक में स्थान मिला।


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