रामविलास पासवान की LJP 2005 में 29 सीटें जीतकर किंगमेकर बनी थी। बाद के चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन गिरकर 1 सीट तक पहुँच गया। अब NDA ने चिराग पासवान को फिर 29 सीटें दी हैं, जो उनकी सियासी साख के लिए एक बड़ी परीक्षा है।

पटनाः बिहार की सियासत में एक बार फिर पासवान फैक्टर चर्चा में है। एनडीए (NDA) के सीट बंटवारे के ऐलान के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 29 सीटें मिली हैं और इसके साथ ही शुरू हो गई है वो पुरानी बहस कि क्या चिराग पासवान वाकई इतनी सीटों के काबिल हैं? क्योंकि आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं। लोजपा (LJP) का ग्राफ पिछले बीस सालों में 29 सीटों से गिरकर 1 सीट तक आ चुका है। तो क्या 2025 में पासवान ब्रांड राजनीति फिर से अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर पाएगी? आइए, इस सियासी सफर को करीब से समझते हैं।

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जब रामविलास पासवान थे बिहार के ‘किंगमेकर’

लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना 2000 में रामविलास पासवान ने की थी। उस वक्त वो बिहार के सबसे चर्चित दलित नेता थे। जो न सिर्फ राज्य बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक बड़ी राजनीतिक ताकत माने जाते थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके LJP ने 4 सीटें जीतीं और जबरदस्त प्रदर्शन किया। इस जीत ने पार्टी को बिहार की राजनीति में ‘निर्णायक खिलाड़ी’ बना दिया। 2005 का विधानसभा चुनाव इसका प्रमाण था।

2005: पासवान की पीक पॉलिटिक्स

फरवरी 2005 में हुए चुनाव में LJP ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा। परिणाम जब आए तो पासवान की पार्टी ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की यह LJP का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था। इतना मजबूत परिणाम कि पासवान खुद किंगमेकर बन गए। लालू प्रसाद यादव ने उन्हें मुख्यमंत्री बनने का ऑफर भी दिया, लेकिन रामविलास पासवान ने उस वक्त “मुस्लिम मुख्यमंत्री” की मांग रख दी। यही फैसला उनके राजनीतिक ग्राफ पर भारी पड़ा क्योंकि कोई भी पक्ष (ना RJD, ना JDU-BJP) सरकार नहीं बना पाया, और विधानसभा भंग कर दी गई। नवंबर 2005 में फिर चुनाव हुए इस बार नीतीश कुमार की जेडीयू और भाजपा ने गठबंधन में मैदान मारा और पूर्ण बहुमत हासिल किया। LJP की सीटें 29 से घटकर सिर्फ 10 रह गईं।

2009–2010: जब पासवान की सियासी रफ्तार थम गई

2009 में रामविलास पासवान ने अलग मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ा, जिसमें RJD, LJP और समाजवादी पार्टी शामिल थीं। पर यह गठबंधन पूरी तरह फ्लॉप साबित हुआ। LJP को एक भी सीट नहीं मिली, जबकि RJD सिर्फ 4 सीटों तक सिमट गई। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में LJP ने फिर RJD के साथ गठबंधन किया, लेकिन पार्टी 6.75% वोट शेयर के बावजूद सिर्फ 3 सीटें जीत सकी। पासवान की चमक अब फीकी पड़ चुकी थी।

2014 में चिराग पासवान का सियासी डेब्यू

रामविलास पासवान के साथ अब सियासी मंच पर चिराग पासवान की एंट्री हो चुकी थी। उन्होंने राजनीति की हवा भांप ली थी और बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में यह फैसला मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। LJP ने 7 में से 6 सीटों पर जीत हासिल की और चिराग पासवान खुद जमुई से सांसद बने। यहीं से LJP ने एनडीए में दोबारा अपनी जगह बनाई।

जब NDA में भी LJP नहीं चमकी

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में LJP, BJP और RLSP के साथ एनडीए में शामिल थी। उसे 40 सीटें दी गईं लेकिन परिणाम बेहद निराशाजनक रहे। पार्टी को सिर्फ 2 सीटें मिलीं। बाकी 38 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की लहर में LJP का सारा समीकरण बिखर गया। पासवान ब्रांड की चमक अब भी फीकी थी।

चिराग पासवान का विद्रोह और पार्टी की सबसे बड़ी हार

2020 का चुनाव LJP के लिए ‘ड्रामेटिक टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ। नीतीश कुमार से नाराज होकर चिराग पासवान ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। पार्टी ने 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन नतीजा निराशाजनक रहा। LJP सिर्फ एक सीट पर जीत पाई और वो विधायक बाद में JDU में शामिल हो गया। यह चिराग का सबसे बड़ा राजनीतिक जुआ था जो पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हुआ। इसके बाद पार्टी टूट गई, चाचा पशुपति पारस ने बगावत कर दी और LJP दो हिस्सों में बंट गई।

नए नाम, पुराना जोश, लेकिन चुनौती वही

अब 2025 में चिराग पासवान फिर मैदान में हैं। पहली बार परिवार से अलग, अपनी नई पहचान और “रामविलास की विरासत” दोनों को लेकर। एनडीए ने उन्हें 29 सीटें दी हैं, वही संख्या जो कभी रामविलास पासवान के स्वर्णकाल की पहचान थी। पर फर्क यह है कि तब LJP सत्ता की चाबी थी, आज उसे अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़नी है। एनडीए में लोजपा (रामविलास) की चुनौती तीन मोर्चों पर है। नीतीश कुमार और जेडीयू का मजबूत संगठन, बीजेपी की प्रमुखता के बीच अपनी जगह बनाना और दलित-युवा वोट बैंक को दोबारा अपने पाले में लाना

क्या कहते हैं सियासी विश्लेषक?

राजनीतिक जानकारों का कहना है, “एनडीए में चिराग पासवान की सियासी अहमियत उनके वोट शेयर से ज्यादा उनके प्रतीकात्मक प्रभाव की वजह से है। दलित राजनीति में वो फिलहाल अकेले ‘युवा चेहरा’ हैं जो वोट से ज्यादा नैरेटिव बनाते हैं।” हालांकि, आंकड़ों की नजर से देखें तो 29 सीटों पर दावा साहसिक या अतिआत्मविश्वास वाला कदम दोनों हो सकता है। क्योंकि LJP का पिछले तीन विधानसभा चुनावों में औसत परफॉर्मेंस 5% से भी कम रहा है।