लालू यादव की दूसरी बेटी रोहिणी आचार्य इन दिनों काफी चर्चा में हैं। कारण है लालू परिवार का अंदरूनी कलह। लेकिन आज हम किसी और बारे में आपको बताने जा रहे हैं, जो है उनका नाम…

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले राजद और लालू परिवार की राजनीति में हलचल लगातार बनी हुई है। इसके मध्य में हैं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की बड़ी बहन और लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रोहिणी का नाम और उनका टाइटल ‘आचार्य’ रखे जाने के पीछे भी रोचक किस्सा है, जो अब तक कई लोगों के लिए अनसुना रहा।

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रोहिणी नाम की कहानी

रोहिणी आचार्य का जन्म 1979 में हुआ। उस समय राबड़ी देवी दूसरी बार मां बनने वाली थीं, लेकिन डिलिवरी से ठीक पहले कुछ जटिलताएँ सामने आईं। तत्कालीन हालात में पटना की प्रसिद्ध महिला डॉक्टर कमला आचार्य को बुलाया गया। डॉक्टर ने सफल ऑपरेशन कर राबड़ी देवी और नवजात रोहिणी दोनों की जान सुरक्षित रखी।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब फीस की बात आई, तो डॉक्टर कमला आचार्य ने इसे लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र अनुरोध यह है कि लालू यादव अपनी बेटी को उनका सरनेम ‘आचार्य’ दें। लालू यादव ने यह सौभाग्य स्वीकार कर लिया और इसी वजह से नवजात का नाम रोहिणी आचार्य पड़ा।

रोहिणी का नाम और परिवार की पारंपरिक सोच

नाम ‘रोहिणी’ का चयन जन्म नक्षत्र के अनुसार किया गया। इस तरह से रोहिणी का नाम न सिर्फ ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुरूप रखा गया, बल्कि उसमें डॉक्टर के प्रति सम्मान और आभार भी जुड़ा। इसके साथ ही उनका सरनेम ‘आचार्य’ परिवार के भीतर एक अनोखी पहचान बन गया, जो आज भी मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है।

क्यों चर्चा में हैं रोहिणी आचार्य

रोहिणी आचार्य इस समय चर्चा में हैं क्योंकि उन्होंने राजद और लालू परिवार के कुछ वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ अपनी नाराजगी सोशल मीडिया के माध्यम से जताई है। खासकर तेजस्वी यादव के करीबी संजय यादव को लेकर उनका असंतोष राजनीतिक हलचल का कारण बना है। उन्होंने परिवार और पार्टी के कई सोशल मीडिया अकाउंट्स को अनफॉलो कर दिया और अपना अकाउंट प्राइवेट कर लिया। 

रोहिणी की नाराजगी का मुख्य कारण परिवार के अंदर उनकी राय की अनदेखी और राजनीतिक निर्णयों में उनका सम्मान न मिलना बताया जा रहा है। इसके बाद वे सिंगापुर लौट गईं, जहां वे फिलहाल अपने निजी मामलों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। उनका यह कदम उनके राजनीतिक मोहभंग और परिवार में बढ़ते तनाव का प्रतीक माना जा रहा है। इस विवाद से लालू परिवार में असंतुलन और पार्टी के चुनावी अभियान पर भी असर पड़ा है।