NHAI’s Green Highway Model: NHAI सड़क निर्माण में फ्लाई ऐश और औद्योगिक कचरे का उपयोग क्यों कर रहा है? छत्तीसगढ़ में ग्रीन हाईवे परियोजनाओं से पर्यावरण और स्थानीय समुदायों को क्या लाभ मिलेगा? वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए NHAI किन इको-फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर काम कर रहा है?
कभी पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती मानी जाने वाली फ्लाई ऐश और औद्योगिक कचरा अब देश के आधुनिक राजमार्गों की नींव बन रहे हैं। सड़क निर्माण की पारंपरिक सोच से आगे बढ़ते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने ऐसी पहल शुरू की है, जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का नया मॉडल पेश कर रही है।

छत्तीसगढ़ में चल रही कई राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आई हैं। यहां थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाली फ्लाई ऐश, स्टील उद्योग के अपशिष्ट और पुराने टायरों जैसी सामग्रियों का उपयोग कर पर्यावरण-अनुकूल सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। इससे न केवल औद्योगिक कचरे का बेहतर प्रबंधन हो रहा है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी मदद मिल रही है।
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सड़क निर्माण में रिकॉर्ड स्तर पर हुआ फ्लाई ऐश का उपयोग
NHAI के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में वर्ष 2024-25 के दौरान सड़क परियोजनाओं में रिकॉर्ड 2.17 करोड़ मीट्रिक टन फ्लाई ऐश का उपयोग किया गया। इसके बाद वर्ष 2025-26 में 62 लाख मीट्रिक टन से अधिक फ्लाई ऐश सड़क निर्माण में खपाई गई। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2026-27 में भी यह अभियान लगातार जारी है और अब तक लगभग 20 लाख मीट्रिक टन फ्लाई ऐश का इस्तेमाल किया जा चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लाई ऐश के उपयोग से सड़कों की गुणवत्ता बेहतर होती है और मिट्टी की आवश्यकता भी कम पड़ती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटता है।
पुराने टायर, स्टील स्लैग और बायो-बिटुमेन से बन रहे ग्रीन हाईवे
सिर्फ फ्लाई ऐश ही नहीं, बल्कि सड़क निर्माण में वैकल्पिक और पुनर्चक्रित सामग्रियों के उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्ष 2024-25 में करीब 30,477 मीट्रिक टन तथा 2025-26 में 2,691 मीट्रिक टन स्टील स्लैग, अनुपयोगी टायरों के रबर और बायो-बिटुमेन जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया। यह पहल ग्रीन हाईवे की उस अवधारणा को मजबूत करती है जिसमें सड़क निर्माण के दौरान पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखने का प्रयास किया जाता है।
जल संरक्षण को भी मिला बढ़ावा
राजमार्ग विकास परियोजनाएं अब केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रह गई हैं। NHAI जल संरक्षण और भूजल संवर्धन को भी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर रहा है।
देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे 13 अमृत सरोवरों का निर्माण और पुनर्जीवन किया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों को भी लाभ मिल रहा है। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग पिट्स की संख्या एक वर्ष में 14 से बढ़ाकर 105 कर दी गई। वहीं निर्माण कार्यों और पौधों की सिंचाई के लिए 323 किलोलीटर शोधित जल का उपयोग किया गया, जिससे स्वच्छ पेयजल की बचत सुनिश्चित हुई।
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए तैयार हो रहा अनोखा इंफ्रास्ट्रक्चर
छत्तीसगढ़ के सीतानदी-उदंती अभ्यारण्य में NHAI ने पर्यावरण संरक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का अनूठा उदाहरण पेश किया है। यहां करीब 3 किलोमीटर लंबी आधुनिक सुरंग विकसित की जा रही है, जिससे वाहनों का आवागमन जंगल के ऊपर नहीं बल्कि नीचे से होगा। इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनकी आवाजाही पर कम से कम प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा साउंड बैरियर्स लगाए जा रहे हैं ताकि वाहनों का शोर वन्यजीवों को परेशान न करे। पेड़ों पर रहने वाले जीवों के लिए मंकी कैनोपी और हाथियों सहित अन्य जानवरों के सुरक्षित आवागमन के लिए विशेष एलिफेंट पास और एनिमल अंडरपास भी विकसित किए जा रहे हैं।
बी-कॉरिडोर और मेडिसिन पार्क बढ़ाएंगे ग्रामीण समृद्धि
NHAI अब सड़कों को केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और जैव विविधता को मजबूत करने वाले गलियारे के रूप में विकसित करना चाहता है। इसी सोच के तहत राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे बी-कॉरिडोर विकसित किए जाएंगे। इससे मधुमक्खियों के जरिए प्राकृतिक परागण बढ़ेगा और किसानों की फसल उत्पादकता में सुधार होगा। वहीं खाली और बंजर जमीनों पर मेडिसिन पार्क स्थापित किए जाएंगे, जहां नीम, तुलसी, एलोवेरा और आंवला जैसे औषधीय पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाएगा।
"एक पेड़ माँ के नाम 2.0" अभियान से हरित राजमार्गों को मिली रफ्तार
हरित राजमार्गों के निर्माण को गति देने के लिए NHAI ने "एक पेड़ माँ के नाम 2.0" अभियान के तहत छत्तीसगढ़ में उल्लेखनीय कार्य किया है। पिछले वर्ष राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे और डिवाइडर्स पर ढाई लाख से अधिक पौधे लगाए गए। यह अभियान न केवल हरित आवरण बढ़ाने में मदद कर रहा है, बल्कि सड़कों को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।
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