महाकुंभ 2025 की भगदड़ में एक पिता अपने बेटे से बिछड़ गया। बेटा अब तक पिता को ढूंढ रहा है, लेकिन प्रशासन से कोई मदद नहीं मिल रही। क्या मिलेगा पिता का पता?

महाकुंभ 2025 में मौनी अमावस्या स्नान के दौरान संगम तट पर हुई भगदड़ का दर्द आज भी कई दिलों में कसा हुआ है। मध्य प्रदेश के जबलपुर का एक युवक, सत्यम सुहाने, अपने पिता की गुमशुदगी का दर्द महसूस कर रहा है, जो 27 जनवरी को प्रयागराज संगम स्नान के लिए ट्रेन पकड़कर रवाना हुए थे। लेकिन उस दिन के बाद से उनके पिता का कोई पता नहीं चला।

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एक अनसुनी पुकार, खोया हुआ विश्वास

27 जनवरी को जब 56 वर्षीय सुशील कुमार सुहाने ने अपने पिता को विदा किया था, तो उम्मीदें आसमान छू रही थीं। सुहाने परिवार के लिए यह पल बेहद खास था, लेकिन 28 जनवरी को रेलवे स्टेशन से पिता से संपर्क होने के बाद अचानक उनके मोबाइल का स्विच ऑफ हो जाना एक अनहोनी की शुरुआत बन गई। तब से अब तक कोई खबर नहीं मिली।

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परिवार में खालीपन और अनसुलझी तकरार

सुशील सुहाने के साथ उनकी पत्नी सीता सुहाने का 15 साल पहले निधन हो चुका था। उनके दो बच्चे हैं – बड़ा बेटा सत्यम और बेटी प्रतिका। सत्यम ने 31 जनवरी को अपने पिता की तलाश में प्रयागराज की गलियों, संगम क्षेत्र, अस्पतालों और पोस्टमार्टम हाउस का रुख किया, लेकिन उन्हें कहीं भी अपने पिता का कोई पता नहीं मिला।

प्रशासन की ठंडी निगाहें और दिल को झकझोरती बातें

सत्यम बताते हैं, "जब हम अपने पिता की तलाश में जाते हैं तो पुलिस से बस यही सुनने को मिलता है कि शायद वे गंगा में बह गए होंगे या मुर्दाघर जाकर देखो।" उनके शब्दों में साफ दिखता है कि प्रशासन की उदासीनता ने उनके परिवार का विश्वास तोड़ दिया है। सत्यम का कहना है, "हमारे घर में अब सिर्फ तीन लोग बचे हैं। चाहे पिता जिंदा हों या मुर्दा, मैं उन्हें लेकर ही लौटूंगा।"

महाकुंभ का दर्द: एक संदेश जो हर किसी के दिल को छू ले

यह घटना महाकुंभ में हुई भगदड़ की कठोर सच्चाई और प्रशासन की उदासीनता को उजागर करती है। कई परिवारों की पुकार अनसुनी रह गई है, और उनका दर्द आज भी उन्हें चैन से सोने नहीं देता। सत्यम सुहाने जैसे परिवार आज भी अपने खोए हुए अपनों की तलाश में लगे हुए हैं – एक ऐसी पुकार जो सुनाई नहीं देती, लेकिन दिलों में गूंजती रहती है।

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