राम मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा ने प्रोजेक्ट की चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि अब श्रद्धालुओं का अनुभव बेहतर बनाना प्राथमिकता है, जो अभी 60% ही पूरा है और इसमें कई सुधार किए जाने हैं।
राम मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रिंसिपल सेक्रेटरी, नृपेंद्र मिश्रा ने पहली बार इस प्रोजेक्ट से जुड़ी कई अंदर की बातें बताई हैं। एशियानेट न्यूजेबल के साथ एक खास बातचीत में, मिश्रा ने बताया कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने में कितनी बड़ी तकनीकी, प्रशासनिक और आध्यात्मिक मेहनत लगी है। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि श्रद्धालुओं को एक वर्ल्ड-क्लास अनुभव देने के लिए अभी और क्या-क्या किया जाना बाकी है।

राम मंदिर की सबसे बड़ी चुनौतियां
मिश्रा बताते हैं कि आज मंदिर भले ही बनकर तैयार दिखता है, लेकिन इसके निर्माण का हर कदम इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की चुनौतियों से भरा था। सबसे बड़ी तकनीकी मुश्किलों में से एक टाइटेनियम के हिस्सों को लेकर आई। इंजीनियरों ने पाया कि इसे बनाने की प्रक्रिया में 52 प्रतिशत से ज़्यादा मटीरियल बर्बाद हो रहा था। इसके बाद कमेटी ने प्राइवेट सेक्टर के विशेषज्ञों सहित कई एक्सपर्ट्स से राय ली, ताकि एक तकनीकी रूप से सही और किफ़ायती समाधान निकाला जा सके।
मिश्रा इस मंदिर को "एक सपना जो किश्तों में साकार हुआ" कहते हैं। वो इसका श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उन करोड़ों भक्तों, संतों और विद्वानों को देते हैं, जिन्होंने सोचा था कि भगवान राम का मंदिर कैसा होना चाहिए। मंदिर से जुड़ा हर कलात्मक फ़ैसला, जैसे कि संतों की कांस्य प्रतिमाएं लगाना, वेदों, पुराणों और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं के जानकारों से सलाह के बाद ही लिया गया। विद्वानों के एक पैनल ने 79 संतों और महापुरुषों को चुना, जिनका जीवन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के आदर्शों को दिखाता है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या वो मंदिर के काम से संतुष्ट हैं, तो मिश्रा ने बड़ी ईमानदारी से जवाब दिया। उन्होंने कहा, "मेरी संतुष्टि तो भक्तों के चेहरे पर दिखने वाले भाव से होगी।" उनके मुताबिक, इस प्रोजेक्ट को सिर्फ़ इसकी बनावट से नहीं, बल्कि इस बात से आंका जाना चाहिए कि श्रद्धालु कितनी सहजता से दर्शन कर पाते हैं।
श्रद्धालुओं के अनुभव को बेहतर बनाना
उनका अनुमान है कि एक श्रद्धालु के नज़रिए से, मंदिर का इकोसिस्टम अभी "लगभग 60 प्रतिशत ही पूरा हुआ है।" आने वाले समय में कई सुधार किए जाने हैं, जैसे कि कई भाषाओं में साइन बोर्ड, पीने के पानी के ज़्यादा पॉइंट्स, छायादार रास्ते, जूते-चप्पल रखने के लिए बेहतर सिस्टम, आने-जाने के लिए आसान रास्ते और देश भर से आने वाले बुजुर्ग भक्तों के लिए अतिरिक्त सुविधाएं।
मिश्रा ने यह भी खुलासा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्लानिंग के दौरान एक साफ़ निर्देश दिया था—राम मंदिर कभी भी सिर्फ़ उत्तर भारत का मंदिर नहीं दिखना चाहिए। बल्कि, इसे सनातन धर्म की व्यापक भावना को दर्शाना चाहिए, जिसमें हर क्षेत्र, भाषा और परंपरा के भक्तों का स्वागत हो।
इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में मंदिर के 71 एकड़ के विशाल परिसर के विस्तार की योजनाओं पर भी बात हुई। भविष्य में यहां एक 3D राम कथा म्यूज़ियम, धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए एक बड़ा ऑडिटोरियम, बेहतर बागवानी, श्रद्धालुओं के लिए और ज़्यादा सुविधाएं, पानी के स्रोतों से कूलिंग सिस्टम और राम जन्मभूमि आंदोलन में अपनी जान कुर्बान करने वाले कारसेवकों के लिए स्मारक बनाए जाएंगे।
मिश्रा ने बताया कि अयोध्या की भीषण गर्मी में भी श्रद्धालुओं को आराम देने के लिए नेचुरल कूलिंग तकनीक, ढके हुए रास्ते, पीने के पानी के स्टेशन और छायादार कैनोपी लगाए जा रहे हैं। लोगों से मिल रहे फीडबैक के आधार पर लगातार सुधार किए जा रहे हैं, जिससे यह प्रोजेक्ट एक खत्म हो चुकी इमारत न होकर, एक लगातार विकसित होने वाली प्रक्रिया बन गया है।
नृपेंद्र मिश्रा का आध्यात्मिक सफ़र
अपने व्यक्तिगत सफ़र पर बात करते हुए मिश्रा कहते हैं कि राम मंदिर प्रोजेक्ट ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी समेत दशकों तक प्रशासनिक सेवा में रहने के बाद, वो मानते हैं कि पहले वो अपनी उपलब्धियों को व्यक्तिगत सफलता के चश्मे से देखते थे। लेकिन मंदिर के लिए पांच साल काम करने ने उन्हें विनम्रता सिखाई।
उन्होंने आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी के एक संदेश को याद किया, जिन्होंने उन्हें याद दिलाया था कि हर व्यक्ति केवल "एक माध्यम" है जिसे भगवान ने एक दिव्य जिम्मेदारी पूरी करने के लिए चुना है। इस संदेश ने नेतृत्व और सेवा को लेकर उनका नज़रिया ही बदल दिया।
मिश्रा के अनुसार, शायद इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात लोगों की सामूहिक भागीदारी है। इंजीनियर, ठेकेदार, कारीगर और टेक्नोलॉजी कंपनियां सिर्फ़ पेशेवर के तौर पर नहीं, बल्कि एक भक्त के रूप में आगे आईं। कई संगठनों ने तो अपनी प्रोफेशनल फीस भी नहीं ली और इसे भगवान राम के लिए एक सेवा माना। मंदिर के लिए 4 लाख से ज़्यादा गांवों के 10 करोड़ से ज़्यादा परिवारों से दान इकट्ठा किया गया, जिससे लगभग 3,200 करोड़ रुपये जमा हुए।
मिश्रा के लिए सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उस चीज़ की सुरक्षा करना थी जिसे वो बार-बार "भगवान का पैसा" कहते हैं। वो कहते हैं कि हर खर्च को पूरी जवाबदेही और श्रद्धा के साथ परखा गया, क्योंकि यह मंदिर करोड़ों भक्तों का है।
अब जब निर्माण अपने आखिरी चरण में है, तो राम मंदिर सिर्फ़ एक वास्तुशिल्प का अजूबा नहीं, बल्कि आस्था, सेवा और राष्ट्रीय भागीदारी का एक जीता-जागता प्रतीक बनकर उभर रहा है। एशियानेट न्यूजेबल के साथ इस खास बातचीत में, नृपेंद्र मिश्रा ने यह साफ़ कर दिया है कि भले ही मंदिर का ढांचा पूरा होने वाला है, लेकिन हर भक्त के लिए एक आदर्श तीर्थ अनुभव बनाने का मिशन अभी शुरू ही हुआ है।
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