उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (ऊर्जा) आर मीनाक्षी सुंदरम ने 1320 मेगावाट थर्मल पावर खरीद पर उठे विवाद को खारिज कर दिया है। उन्होंने साफ किया कि यह पूरी प्रक्रिया नियमों, पारदर्शी टेंडरिंग और UERC की मंजूरी के साथ हो रही है।
उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (ऊर्जा) आर मीनाक्षी सुंदरम ने गुरुवार को 1320 मेगावाट थर्मल पावर की प्रस्तावित खरीद पर राजनीतिक दलों के सवालों का जवाब दिया। उन्होंने साफ किया कि यह पूरी प्रक्रिया तय नियमों, तकनीकी जरूरतों, पारदर्शी टेंडरिंग और उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) की मंजूरी के बाद ही आगे बढ़ाई जा रही है।
सुंदरम ने कहा कि बिजली खरीद को लेकर लगाए जा रहे आरोप बिल्कुल बेबुनियाद हैं। सरकार का मकसद राज्य की भविष्य की बिजली जरूरतों को पूरा करना है, न कि किसी खास कंपनी को फायदा पहुंचाना।
टेंडर प्रक्रिया में नियमों का पूरा पालन
टेंडर प्रक्रिया पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने 2019 में एक सामान्य मॉडल बिडिंग डॉक्यूमेंट जारी किया था। हर प्रोजेक्ट की तकनीक, लोकेशन, ईंधन की उपलब्धता और ट्रांसपोर्टेशन के खर्च को देखते हुए इसमें बदलाव किए जाते हैं। टेंडर के दौरान कंपनियों से मिले सुझावों और आपत्तियों को तकनीकी नजरिए से परखा गया। इसके बाद जरूरी बदलावों को UERC के सामने रखा गया, जिसने लंबी चर्चा के बाद इन्हें मंजूरी दी।
हर स्तर पर बनी रही प्रतिस्पर्धा
सुंदरम ने उन दावों को भी खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि बिना किसी कॉम्पिटिशन के एक ही कंपनी को टेंडर दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रिक्वेस्ट फॉर कोटेशन (RFQ) स्टेज में पांच कंपनियां योग्य पाई गई थीं और रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) स्टेज में भी पूरा कॉम्पिटिशन बना रहा।
उन्होंने कहा, "आखिरी चुनाव पारदर्शी टेंडरिंग के जरिए तय होने वाले कुल टैरिफ के आधार पर ही होगा।" प्रमुख सचिव ने बताया कि 1320 मेगावाट बिजली खरीद का मकसद उत्तराखंड की लंबी अवधि की जरूरतों को पूरा करना और लोगों को बिना रुकावट बिजली देना है।
प्लांट की लोकेशन और खर्च पर सफाई
उन्होंने बताया कि टेंडर बनाते समय उत्तराखंड के पर्यटन, तीर्थाटन और पर्यावरण का खास ध्यान रखा गया है। थर्मल पावर प्लांट के लिए बहुत ज्यादा कोयले की जरूरत होती है और इसे दूर से लाने में खर्च बढ़ता है। इसलिए टेंडर में देश के किसी भी सही लोकेशन पर प्लांट लगाने की छूट दी गई है। इससे कंपनियां ईंधन और ट्रांसपोर्टेशन का खर्च देखकर सही रेट दे सकेंगी।
सुंदरम ने साफ किया कि उत्तराखंड में प्लांट लगाने पर कोई रोक नहीं है। अगर कोई कंपनी राज्य में प्लांट लगाकर सही रेट पर बिजली देती है, तो वह भी इस प्रक्रिया में शामिल हो सकती है।
ट्रांसमिशन के खर्च पर उन्होंने कहा कि उत्तराखंड तक बिजली पहुंचाने का खर्च टेंडर और टैरिफ की शर्तों के हिसाब से तय होगा। उन्होंने कहा, "यह दावा बिल्कुल गलत है कि राज्य के बाहर प्लांट लगने से सारा अतिरिक्त खर्च ग्राहकों को उठाना पड़ेगा।" ग्राहकों पर पड़ने वाले असल आर्थिक असर का आकलन कुल बिजली टैरिफ के आधार पर ही होगा।
फिक्स्ड चार्ज और निर्माण की जानकारी
फिक्स्ड चार्ज के मुद्दे पर सुंदरम ने बताया कि मॉडल बिडिंग डॉक्यूमेंट में फिक्स्ड चार्ज की लिमिट 70 प्रतिशत तय थी, जबकि कम से कम 30 प्रतिशत फ्यूल चार्ज के लिए रखा गया था। कंपनियों के असल खर्च और लोकेशन की स्थिति को देखते हुए UPCL ने फिक्स्ड चार्ज की लिमिट को 75 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा, जिससे फ्यूल चार्ज 25 प्रतिशत तक रह सके।
उन्होंने कहा कि बिजली की कीमत सिर्फ फिक्स्ड चार्ज से तय नहीं होती, बल्कि इसमें फिक्स्ड और फ्यूल दोनों खर्च शामिल होते हैं। UERC ने पूरी चर्चा के बाद ही इस प्रस्ताव को पास किया था। सुंदरम ने बताया कि फिक्स्ड चार्ज की लिमिट 70 से 75 प्रतिशत होने का मतलब यह नहीं है कि ग्राहकों पर सीधा बोझ पड़ेगा, क्योंकि फाइनल पेमेंट टेंडर में तय हुए कुल टैरिफ पर ही निर्भर करेगा।
उन्होंने बताया कि 1320 मेगावाट बिजली अलग-अलग चरणों में मिलेगी। इसके लिए निर्माण का समय भी तय कर दिया गया है। पहली यूनिट के लिए 42 महीने और दूसरी यूनिट के लिए 48 महीने का समय दिया गया है।
अन्य विकल्प और भविष्य की योजनाएं
प्रमुख सचिव ने बताया कि बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए UJVNL और THDC के जॉइंट वेंचर के विकल्प पर भी विचार किया गया था। उन्होंने कहा, "THDC असल में NTPC की सब्सिडियरी है और उसे NTPC की नीतियां माननी पड़ती हैं। उनकी मुख्य विशेषज्ञता हाइड्रोपावर और पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स में है। दूसरे क्षेत्रों में काम करने के लिए उन्हें अपने प्रमोटर से मंजूरी लेनी होगी।"
सुंदरम ने यह भी साफ किया कि 25 सालों में 1.60 लाख करोड़ से 1.66 लाख करोड़ रुपये का जो अनुमानित आंकड़ा बताया जा रहा है, वह कोई एकमुश्त पेमेंट नहीं है। यह पूरे 25 साल में होने वाला संभावित कुल पेमेंट है। राज्य की भविष्य की बिजली जरूरतों का आकलन सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की रिसोर्स एडिक्वेसी स्टडी के आधार पर किया गया है। असल पेमेंट फाइनल टैरिफ, सप्लाई की गई बिजली और कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों पर निर्भर करेगा।
राज्य की जरूरत के लिए हो रही खरीद
सुंदरम ने दोहराया कि यह खरीद प्रक्रिया सिर्फ किसी एक विभाग का फैसला नहीं है। इसमें तकनीकी जांच, कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा, वित्तीय मूल्यांकन और एक स्वतंत्र नियामक संस्था (UERC) की मंजूरी जैसे कई चरण शामिल हैं।
उन्होंने फिर से साफ किया कि 1320 मेगावाट बिजली खरीदने का मुख्य मकसद उत्तराखंड की भविष्य की जरूरतों को सुरक्षित करना है, न कि किसी कंपनी को फायदा पहुंचाना। आखिरी चुनाव पारदर्शी टेंडरिंग के जरिए ही किया जाएगा।
(हेडलाइन को छोड़कर, इस खबर को एशियानेट न्यूजेबल हिंदी टीम ने संपादित नहीं किया है और इसे सिंडिकेट फीड से प्रकाशित किया गया है।)


