अमेरिका में Snapchat से जुड़े कथित मामले ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानिए भारत में Snapchat के करोड़ों यूजर्स के लिए यह मामला क्यों अहम है, सोशल मीडिया कंपनियों पर क्या आरोप हैं और बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के जरूरी उपाय।

आज सोशल मीडिया हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। परिवार, दोस्त और दुनिया से जुड़े रहने का यह सबसे आसान माध्यम है। लेकिन इसी डिजिटल दुनिया का एक खतरनाक पहलू अब फिर चर्चा में है। अमेरिका में स्नैपचैट की पैरेंट कंपनी स्नैप पर आरोप लगा है कि उसके कुछ फीचर्स का इस्तेमाल कर एक 25 वर्षीय आरोपी ने 12 साल की बच्ची को अपने जाल में फंसाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। इस घटना ने दुनिया भर में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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अमेरिका की घटना क्यों बनी बड़ी चेतावनी?

आरोप है कि आरोपी ने Snapchat के Quick Add और Snap Map जैसे फीचर्स के जरिए बच्ची तक पहुंच बनाई। इसी बीच एक सर्वे में सामने आया कि नाबालिग यूजर्स में लगभग आधे बच्चों ने पिछले एक साल के दौरान स्नैपचैट पर आपत्तिजनक या असुरक्षित कंटेंट देखा। वहीं अमेरिका में Meta, TikTok, YouTube और Snapchat समेत कई बड़ी टेक कंपनियां बच्चों की सुरक्षा से जुड़े हजारों मुकदमों का सामना कर रही हैं।

भारत के लिए मामला ज्यादा संवेदनशील क्यों?

भारत Snapchat का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। जहां अमेरिका में इसके करीब 10.6 करोड़ यूजर्स हैं, वहीं भारत में यह संख्या लगभग 20.8 करोड़ तक पहुंच चुकी है। बड़ी संख्या में किशोर और स्कूली छात्र इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अमेरिका में उठे सवाल भारत के लिए भी चेतावनी हैं कि डिजिटल सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

क्या मुनाफा सुरक्षा पर भारी पड़ रहा है?

डॉक्यूमेंट्री The Social Dilemma, The Facebook Files जैसी जांच रिपोर्ट और The Age of Surveillance Capitalism जैसी चर्चित किताबों में यह सवाल उठाया गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूजर्स की अधिकतम भागीदारी और विज्ञापन से कमाई को प्राथमिकता देते हैं। आलोचकों का कहना है कि कई बार एल्गोरिदम ऐसा कंटेंट आगे बढ़ाते हैं जो ज्यादा ध्यान खींचे, जबकि सुरक्षा पीछे छूट जाती है। हालांकि कंपनियां लगातार दावा करती रही हैं कि वे सुरक्षा फीचर्स और मॉडरेशन को मजबूत कर रही हैं।

बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या करें?

यदि घर में 18 साल से कम उम्र का बच्चा सोशल मीडिया इस्तेमाल करता है, तो उसकी प्राइवेसी सेटिंग्स नियमित रूप से जांचें। Quick Add जैसे फीचर्स बंद रखें, लाइव लोकेशन केवल भरोसेमंद लोगों के साथ साझा करें और किसी भी संदिग्ध मैसेज या प्रोफाइल की तुरंत रिपोर्ट करें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों के साथ ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर खुलकर बातचीत करें।

सरकारें भी सख्त हो रही हैं

यूरोपीय संघ का Digital Services Act (DSA) और भारत के आईटी नियम सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए कानून ही नहीं, बल्कि कंपनियों को अपने एल्गोरिदम और सुरक्षा सिस्टम में भी बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। डिजिटल दुनिया में तकनीक जितनी तेज़ी से आगे बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से सुरक्षा के मानकों को भी मजबूत करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।