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मौत की धमकी दी, नहीं मानी तो घर को बम से उड़ा दिया, उस महिला की कहानी, जिसने तालिबान की क्रूरता झेली

काबुल पर कब्जा करने के एक महीने बाद तालिबान ने स्कूल बंद करवा दिए। सभी लड़कियां को घर पर रहने के लिए कहा। 

Afghanistan Story of woman victim of Taliban brutality
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Kabul, First Published Aug 22, 2021, 11:28 AM IST
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काबुल. 20 साल बाद दोबारा अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा है। 1996 से लेकर 2001 तक तालिबान के राज में महिलाओं की जिंदगी नर्क जैसी हो गई थी। नीलाब जरीफ उन्हीं महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने 1996 के खौफ को देखा है। उन्होंने कहा कि तालिबान लाख कहे कि वह सुधर गया है। हिंसा नहीं करेगा। उसपर किसी को विश्वास नहीं करना चाहिए। 

नीलाब कार्डिफ में रहती हैं। वे महिलाओं के अधिकारी के लिए लड़ती हैं। एक्टिविस्ट हैं। वकील हैं। उनके चार बच्चे हैं। उन्होंने अपने वक्त को याद करते हुए कहा कि मुझे वह दिन याद है, जब लोग आपस में बात कर रहे थे कि तालिबान ने काबुल में कब्जा कर लिया था, लेकिन कोई अराजकता नहीं थी। ऐसा कुछ भी नहीं था। लोगों में डर था, लेकिन घबराहट और अराजकता नहीं।

एक महीने बाद दिखी तालिबान की क्रूरता
काबुल पर कब्जा करने के एक महीने बाद तालिबान ने स्कूल बंद करवा दिए। सभी लड़कियां को घर पर रहने के लिए कहा। नीलाब ने कहा कि तालिबानी हमारे घर में भी आए। मेरे पिताजी को लड़कियों को पढ़ाना बंद करने के लिए कहा। मेरा परिवार डरा था। मैंने लड़कियों को ट्यूशन देना बंद कर दिया। हम पाकिस्तान चले गए, क्योंकि काबुल में हमारा बहुत मुश्किल होने लगा था। फिर साल 2002 में हम वापस अफगानिस्तान लौट आए। अब तालिबान सत्ता में नहीं था। लेकिन उसका डर हर जगह मौजूद था। 
  
वहां एक रेडियो स्टेशन बनाया गया। जहां मुझे काम मिल गया। मैंने शुरू में महिलाओं के अधिकारों को लेकर कई कार्यक्रम किए। लगभग तीन महीन बाद मुझे तालिबान से धमकियां मिलने लगीं। मैंने धमकियों को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन एक दिन उन्होंने हमारे दरवाजे पर बमबारी कर दी। हालांकि किसी को चोट नहीं लगी।

आगे चलकर मेरी शादी हुई। एक बेटा हुआ। मैंने काबुल में महिला अधिकारों पर काम करने वाले संगठन में दूसरी नौकरी कर ली। इस पर भी तालिबान ने नाराजगी जताई। मुझे फिर से धमकियां मिलीं। जान से मारने की धमकी। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी नौकरी छोड़नी होगी। 

2007 में अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला किया
इस बार मेरे साथ मेरा बेटा था। हमने तय किया कि 2007 में अफगानिस्तान छोड़कर ब्रिटेन चले जाएंगे। मुझे लगता है कि तालिबान कुछ भी कह ले वह सुधरने वाला नहीं है। ऐसे में तालिबान पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।

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