देश बदल रहा है। बेटियों को भी बेटे का दर्जा दिया जाने लगा है। लेकिन आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो बेटियों और बेटों में फर्क समझते हैं। आज हम आपको एक ऐसी IAS अफसर की कहानी बताने जा रहे हैं जिन्होंने बेटी होने के बाद समाज के तानो का सहा है

लखनऊ(Uttar Pradesh ). देश बदल रहा है। बेटियों को भी बेटे का दर्जा दिया जाने लगा है। लेकिन आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो बेटियों और बेटों में फर्क समझते हैं। आज हम आपको एक ऐसी IAS अफसर की कहानी बताने जा रहे हैं जिन्होंने बेटी होने के बाद समाज के तानो का सहा है। लेकिन मां-बाप के सहयोग और मेहनत के बदौलत एक मुकाम हासिल किया और ताने देने वालों का मुंह बंद कर दिया। 

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2007 बैच की IAS अफसर शीतल वर्मा यूपी के गाजियाबाद की रहने वाली हैं। उनके पिता प्रेम लाल वर्मा कस्टम विभाग से रिटायर्ड हैं। शीतल वर्मा का बचपन दिल्ली में ही बीता। शीतल तीन बहने हैं उनके कोई भाई नहीं है। लेकिन उनके पिता ने बेटियों को ही बेटों की तरह पाला। बेटियों की पढ़ाई-लिखाई पर पूरा ध्यान दिया। उनकी सुविधाओं के लिए कभी खुद की जरूरतों के बारे में नहीं सोचा। लेकिन शीतल व उनकी दोनों बहनों से सफलता हासिल कर मां-बाप के सपनो को साकार कर ये साबित कर दिया कि बेटियां बेटों से कहीं काम नहीं हैं। 

लोग पिता को देते थे ऐसे ताने 
शीतल के पिता को उनके पड़ोसी व रिश्तेदार ताने देते थे। वह कहते थे कि बेटियों को इतना पढ़ा रहे हो उनको शादी के बाद दूसरे घर ही तो जाना है। ज्यादा पढ़ा लिखा दोगे तो शादी के लिए लड़का कहां मिलेगा। ऐसे तानो से उनके पिता को कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो हमेशा से ही बेटियों को आगे पढ़ाने व उन्हें काबिल बनाने की बात सोचते थे। 

पिता को देखकर होता था दुःख 
शीतल बताती हैं कि लोगों द्वारा पिता जी को दिए जाने वाले तानों को सुनकर काफी दुःख होता था। कभी-कभी मन में ख्याल भी आता था कि काश हम लोग लड़के होते। लेकिन पिता जी के हौसले को देखकर मन में फिर से नई ऊर्जा का संचार होता था कि हमने इन सब बातों को नजरअंदाज कर सिर्फ अपनी पढ़ाई और मंजिल पर ध्यान देना है। मैं अपनी दोनों बहनो को भी यही समझाती थी और उनका हौसला बढ़ाती थी। 

तीनो बहनो ने पाई मंजिल तो पूरा हुआ पैरेंट्स का सपना 
शीतल ने साल 2007 में पहले ही अटेम्प्ट में IAS का एग्जाम क्रैक कर लिया। वह 2007 बैच की IAS अफसर हैं। जबकि शीतल की दूसरी बहन प्रियंका दिल्ली विश्विद्यालय में प्रोफेसर है। सबसे छोटी बहन रेलवे में अफसर है। तीनो बहनो से अपनी लगन व मेहनत से सफलता पाकर एक मुकाम हासिल किया और लोगों की निगेटिव बातें खुद बखुद बंद हो गई। 

माता-पिता को मानती हैं सफलता का सही हकदार 
शीतल बताती हैं कि हम तीनो बहनो की सफलता के पीछे सही मेहनत मेरी मां और पिता जी की है। उन्होंने हमारी पढ़ाई और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कभी खुद के लिए कोई शौक ही नहीं पाला। खुद तमाम अभावों में रहे लेकिन कभी हम तीनो बहनो को इसका अहसास नहीं होने दिया। मां और पिता जी की सच्ची तपस्या के कारण आज हम तीनो बहनो ने अपने मंजिल को पाया है।