कांग्रेस यूपी विधानसभा में अब तक की सबसे खराब स्थिति में है। उसके हिस्से में सिर्फ दो सीटें ही आईं। पार्टी के महज चार प्रत्याशी ही पूरे प्रदेश में दूसरे स्थान पर रहे। ये विधानसभा क्षेत्र हैं- जगदीशपुर, खैरागढ़, किदवई नगर और मथुरा। मथुरा में कांग्रेस दूसरे नंबर पर जरूर रही, पर हार-जीत का अंतर एक लाख से ज्यादा का रहा।

लखनऊ: यूपी में खड़ा होने के लिए कांग्रेस को अब बड़ी सर्जरी की जरूरत है। पारंपरिक तौर की जाने वाली समीक्षाओं से काम चलने वाला नहीं है। विधानसभा चुनाव में टिकट देने में जिस तरह के प्रयोग हुए, वे कई सवाल छोड़ गए हैं। करारी हार से पार्टी में नीचे तक नाराजगी दिख रही है। उधर, पदाधिकारियों के इस्तीफा देने का सिलसिला भी शुरू हो गया है।

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कांग्रेस यूपी विधानसभा में अब तक की सबसे खराब स्थिति में है। उसके हिस्से में सिर्फ दो सीटें ही आईं। पार्टी के महज चार प्रत्याशी ही पूरे प्रदेश में दूसरे स्थान पर रहे। ये विधानसभा क्षेत्र हैं- जगदीशपुर, खैरागढ़, किदवई नगर और मथुरा। मथुरा में कांग्रेस दूसरे नंबर पर जरूर रही, पर हार-जीत का अंतर एक लाख से ज्यादा का रहा।

कांग्रेस के ही एक नेता कहते हैं कि प्रयोग के तौर पर निजामाबाद से पार्टी के भीतर ही चर्चित टीम के खास माने जाने वाले अनिल यादव को टिकट दिया गया। वह कुछ समय पहले ही कांग्रेस से जुड़े थे। उन्हें प्रदेश कांग्रेस में संगठन सचिव सरीखा अहम पद भी दिया गया, लेकिन चुनाव में उन्हें सिर्फ 2,297 वोट मिले।

इसी तरह उन्नाव में प्रयोग के तहत उतारे गए प्रत्याशी को महज 1,555 वोट मिले। यानी ये प्रत्याशी कांग्रेस के प्रदेश में मामूली मत प्रतिशत के बराबर भी वोट नहीं पा सके। ऐसे में इस तरह के प्रयोगों का फैसला लेने वालों पर सर्जरी जरूरी है। क्योंकि पार्टी के ही कई पुराने नेताओं ने उस वक्त भी इस पर एतराज जताया था।

रुद्रपुर से कांग्रेस ने अपने पुराने नेता अखिलेश प्रताप सिंह को उतारा। उन्हें 30 हजार से ज्यादा मत मिले। इलाहाबाद उत्तरी से प्रत्याशी बनाए गए कांग्रेस के पुराने नेता अनुग्रह नारायण सिंह को 23 हजार से ज्यादा मत मिले। पुराने कांग्रेसियों का कहना है कि भले ही कांग्रेसी बैक ग्राउंड वाले प्रत्याशी जीत नहीं सके, पर वे नहीं होते तो पार्टी के मत एक फीसदी से नीचे पहुंचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। उनका कहना है कि पूरी पार्टी को अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं के बजाय इवेंट कंपनी के भरोसे छोड़ देने वालों के बारे में विचार करना भी जरूरी है।

पदाधिकारियों के इस्तीफे देने का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद
पार्टी की दुर्दशा पर लखनऊ, उन्नाव और बिजनौर आदि जिलों में पदाधिकारी इस्तीफा दे चुके हैं। यह सिलसिला आगे भी जारी रहने की उम्मीद जताई जा रही है। 90 के दशक से कांग्रेस से जुड़े एक नेता कहते हैं कि हम नए प्रयोगों के खिलाफ नहीं है। मगर ये फैसले एक टीम के तहत लिए जाने चाहिए। अगर बाहर से आए कुछ लोग मनमाने ढंग से फैसला लेंगे तो फिर इससे बेहतर नतीजों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। यह नई ऊर्जा के साथ जुटने और नेतृत्व करने वाली टीम में बदलाव का वक्त है ताकि अगले दो साल कड़ी मेहनत से पार्टी लोकसभा चुनाव तक बेहतर स्थिति में आ सके।