सालेह ने कहा कि मैंने अपने मेंटर अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद को फोन किया। उससे पूछा कि भाई तुम कहां हो। उसने कहा कि वह काबुल में है और अगले कदम की योजना बना रहा है।

काबुल। तालिबान का अफगानिस्तान पर पूर्ण नियंत्रण के बाद भी अफगानियों के लिए लड़ रहे अमरुल्लाह सालेह ने काबुल पर अफगानिस्तान के नियंत्रण और राजनेताओं के देश छोड़ने की घटनाओं का सिलसिलेवार जिक्र करते हुए कहा है कि जो लोग भी यहां से बिना लड़े भाग गए उन्होंने अपनी जमीन के साथ धोखा किया है। हम लड़ेंगे और अंतिम सांस तक जीत के जंग लड़ेंगे।

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एक अंग्रेजी अखबार में लिखे लेख में अमरुल्लाह सालेह ने कहा है कि काबुल पर तालिबान का कब्जा होने के बाद भी हमने ने लड़ने का इरादा नहीं छोड़ा। हम कुछ बहादुर सैनिकों-अधिकारियों के साथ फैसला कर चुके थे कि हम लड़ेंगे और साथ मिलकर लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि मैंने अपने गार्ड को यह आदेश दे रखा था कि अगर मैं घायल हो जाऊं तो मेरे सिर में 2 गोलियां मार देना। मैं तालिबान के आगे घुटने नहीं टेकना चाहता हूं।

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लंदन के एक अखबार में सालेह ने लिखा है, 'संकट के समय जिन नेताओं ने अफगानिस्तान को छोड़ दिया, मेरा मानना है कि उन्होंने अपनी जमीन से धोखा किया है। जिस रात काबुल तालिबानियों के कब्जे में आया, मुझे वहां के पुलिस चीफ ने फोन किया। उन्होंने बताया कि जेल में विद्रोह मच गया है और तालिबानी कैदी भागने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने गैरतालिबानी कैदियों का नेटवर्क तैयार किया हैं। मैंने उन्हें जेल के भीतर विद्रोह का विरोध करने का आदेश दिया। अफगानिस्तान स्पेशल फोर्सेस के साथ मॉब कंट्रोल यूनिट की मदद से जेलों में हालात को संभाला गया। तब के रक्षा मंत्री, गृह मंत्री को भी मैंने फोन किया था और अगली सुबह उनके डिप्टी को भी, पर वो नहीं मिले। दोनों मंत्रालयों में कोई जिम्मेदार अफसर नहीं मिला, जो मुझे ये बता सके कि रिजर्व फोर्सेस या कमांडो तैनात क्यों नहीं किए गए। मुझे शहर में कहीं भी अफगानी सैनिक नहीं मिले, जिन्हें तैनात किया जा सके।

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सालेह ने कहा कि मैंने काबुल के पुलिस चीफ से बात की, जो कि बहुत ही बहादुर इंसान हैं। उन्होंने बताया कि पूर्वी सीमा पर हम हार गए हैं और दक्षिण में भी 2 जिले तालिबानियों के कब्जे में हैं। साथ ही वरदाक की भी यही स्थिति है। उन्होंने कमांडोज की तैनाती के लिए मेरी मदद मांगी। मैंने उनसे कहा था कि जो भी सैनिक उनके साथ हैं, वो उनके साथ ही करीब एक घंटे तक मोर्चे पर डटे रहें, पर मैं उनके लिए कोई फौज नहीं जुटा पाया।'

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जिम्मेदार लड़ नहीं रहे थे भागने में लगे थे

सालेह ने लिखा, 'उन्होंने राष्ट्रपति भवन और पूर्व सुरक्षा सलाहकार हमदुल्ला मोहिब को फोन किया, पर कोई फायदा नहीं हुआ। मैंने भी राष्ट्रपति भवन और सुरक्षा सलाहकार को फोन किया कि कुछ करिए। मुझे भी कोई जवाब नहीं मिला। 15 अगस्त की सुबह 9 बजते-बजते काबुल में हाहाकार मच चुका था।'

इंटेलीजेंस चीफ भी चाहते थे लड़ना, हम आए साथ

15 अगस्त के पहले इंटेलीजेंस चीफ मेरे पास आए और कहा कि जहां भी आप जाएंगे, मैं साथ चलूंगा। अगर तालिबानियों ने रास्ता रोक भी लिया तो हम आखिरी जंग साथ-साथ लड़ेंगे। वे राजनेता जो विदेशों के होटलों और विला में रह रहे हैं, उन्होंने अपने ही लोगों से दगा किया। ये लोग अब गरीब अफगानियों से विद्रोह करने को कह रहे हैं। ये कायरता है। अगर हम विद्रोह चाहते हैं तो इस विद्रोह की अगुआई भी होनी चाहिए।

मेंटर अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद भी पहले से थे तैयार

सालेह ने कहा कि मैंने अपने मेंटर अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद को फोन किया। उससे पूछा कि भाई तुम कहां हो। उसने कहा कि वह काबुल में है और अगले कदम की योजना बना रहा है। मैंने उसे बताया कि मैं भी काबुल में हूं। मैंने कहा कि हमारी फौजों के साथ आइए।

परिवार के संबंध में सारे सबूत मिटा, निकल पड़ा जंग के लिए

सालेह लिखते हैं कि इसके बाद मैं काबुल में अपने घर गया। अपनी बेटी और बीवी की तस्वीरें मिटाईं। अपना कंप्यूटर बटोरा और अपने चीफ गार्ड रहीम से कहा कि अपना हाथ कुरान पर रखो। मैंने उससे कहा कि हम पंजशीर जा रहे हैं और सड़कों पर तालिबानियों का कब्जा है। हम लड़ेंगे और साथ मिलकर लड़ेंगे। अगर मैं घायल हो जाऊं तो मेरे सिर में 2 गोलियां मार देना। मैं तालिबान के आगे घुटने नहीं टेकना चाहता हूं।

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