रूस और यूक्रेन वॉर को शुरु हुए पूरे एक साल हो गए हैं। ऐसे में कई तरह के सवाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे हैं। उसमें जो प्रमुख सवाल है, वह यही कि पिछले एक साल में इस युद्ध का असर दुनिया के बाकी देशों के रिश्तों पर कैसा पड़ा है।  

ग्लोबल डेस्क. रूस और यूक्रेन वॉर को शुरु हुए पूरे एक साल हो गए हैं। ऐसे में कई तरह के सवाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे हैं। उसमें जो प्रमुख सवाल है, वह यही कि पिछले एक साल में इस युद्ध का असर दुनिया के बाकी देशों के रिश्तों पर कैसा पड़ा है। इसके लिए एशियानेट की टीम ने डॉ स्वाति राव से बतौर एक्सपर्ट राय जानी। स्वाति राव मनोहर पार्रिकर - IDSA's में यूरोप और यूरेशिया सेंटर की एसोसिएट फेलो हैं। आइए जानते हैं स्वाति ने क्या बताया?

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स्वाति की मानें तो इस युद्ध से जो सबसे बड़ा बदलाव पिछले एक साल में देखने को मिला है, उसमें नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन और यूनाइटेड यूरोप पुनर्जिवित हुआ है। क्योंकि इस युद्ध से पहले नाटो अपनी प्रतिष्ठा खो चुका था। ऐसा इसलिए क्योंकि यूरोपीय देश रूस से एनर्जी से जुड़ी डील आराम से कर पा रहे थे। बड़े यूरोपीय देशों की नजरों में नाटो का कोई अर्थ नहीं रह गया था। साथ ही यूरोप ने रूस की तरफ से यूक्रेन पर हमले की अपेक्षा नहीं की थी। युद्ध के बाद से कई यूरोपीय देश रूस से सचेत हुए। अबतक उन्हें पावरफुल देश जैसे- फ्रांस, जर्मनी पर बहुत ज्यादा भरोसा था।

इसके अलावा नाटो अब अपने आप को एशिया की ओर रूख कर रहा है। उसने पहली बार चिंता जाहिर करते हुए चीन को सबसे खतरनाक देशों में लिस्ट किया है। अब नाटो के इस रूख से भारत पर भी इसका असर पड़ेगा।

यूनाइटेड यूरोप की जरूरत क्यों?

दरअसल, इस युद्ध के बाद से यूरोपीय देशों की एकता पर भी सवाल उठा है। फ्रांस नाटो के साथ नहीं है। फ्रांस और जर्मनी नाटो से अलग है। इधर, USSR से अलग हुए देश रूस के साथ नजर आए हैं। ऐसे में यूरोपीय देशों को यूनाइटेट रहना जरूरी है।

काऊबॉय कैपिटलिज्म का अंत

युद्ध के बाद से वैश्विक स्तर पर व्यापार के क्षेत्र में कई बदलाव आए हैं। इस दौरान एक भरोसे के कनेक्शन का उदय हुआ है। जो एक तरह से काऊबॉय कैपिटिलिज्म का अंत है। सभी देशों को लग लगने लगा है कि उन्हें व्यापार में लचीलापन लाकर एक पैटर्न में व्यापार करना चाहिए। यही रास्ता केवल प्रभावी है और इसी में सभी का लाभ है। 

रूस से भारत का तेल आयात बढ़ा है। इसमें भारत एक सबसे बड़ा मार्केट बनकर उभरा है। पहले भारत और रूस के बीच तेल का व्यापार 0.2 प्रतिशत था, जो बढ़कर 28 प्रतिशत हो गया है। क्योंकि रूस ने तेल पर भारी छूट दे रखी है।

पहले रूसी तेल यूरोप में सबसे अधिक निर्यात हो रहा था। अब अधिकतर चीन, भारत और तुर्की को जा रहा है। अब इससे रूस से तेल आयात करने वाले देशों के मानचित्र पर काफी बदलाव आया है। यूरोप रूसी उर्जा पर काफी अधिक निर्भर था। अब यह अलग रास्तों से यूरोप के देशों में पहुंच रहा है। इसमें भारत रूस से सस्ता तेल लेकर उसे रिफाइन कर पश्चिम देशों को बेच रहा है, इससे काफी मुनाफा हो रहा है।

ड्रैगन और बियर की जोड़ी सबसे ताकतवर
यहां ड्रैगन का मतलब चीन से है। इसके अलावा रूस को बियर यानी भालू कहा जाता है। अब चीन और रूस की जोड़ी ने मिलकर पूरे जियो पॉलिटिक्स की तस्वीर बदलकर रख दी है। अब इससे तस्वीर साफ है कि दुनिया दो धड़ों में बंट गई है। वेस्ट देश जिनमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया हैं, वहीं दूसरे अन्य देश चीन और रूस की तरफ हैं।

भारत की क्या राय? 
इसके अलावा भारत को G20 की अध्यक्षता मिली है। ऐसे में भारत बहुपक्षवाद में विश्वास बहाल करने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि भारत यह हमेशा कहता रहा है कि दुनिया का एक बड़ा वर्ग है, जो किसी भी तरह के गठबंधन को अस्वीकार करता है। इसे सभी से अलग रखने की आवश्यकता है। मल्टी पॉलिरिटी पर विश्वास करने पर भारत का जोर है।