सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान के रक्षा समझौते से मचा हड़कंप! ईरान ने रियाद को दी खुली चेतावनी- ‘कागजी समझौते’ से नहीं मिलेगी सुरक्षा। आखिर मक्का डिफेंस पैक्ट से क्यों भड़का तेहरान?
तेहरान/रियाद: मिडिल ईस्ट की पहले से ही सुलगती भू-राजनीति में एक नए सैन्य गठबंधन ने आग में घी डालने का काम कर दिया है। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए ऐतिहासिक 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' (Mecca Joint Defense Pact) के सामने आते ही ईरान ने बेहद तल्ख तेवर अपना लिए हैं। ईरान की संसद और राष्ट्रीय सुरक्षा समिति ने इस त्रिपक्षीय सैन्य समझौते को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक "महज कागज़ी टुकड़ा" करार दिया है और रियाद को चेताया है कि विदेशी ताकतों के सहारे कभी स्थायी सुरक्षा हासिल नहीं की जा सकती।
'एक पर हमला, सब पर हमला': आखिर क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता?
इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने एक त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, इस रक्षा समझौते का मूल आधार 'सामूहिक सुरक्षा' है। समझौते में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि तीनों में से किसी भी एक देश पर कोई भी सशस्त्र या सैन्य हमला होता है, तो उसे तीनों राष्ट्रों पर सीधा हमला माना जाएगा। इस पैक्ट का उद्देश्य लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते तनाव के बीच तीनों देशों के सैन्य संसाधनों को एक मंच पर लाना है।
ईरानी सांसद ने क्यों साधा सऊदी पर निशाना?
जैसे ही 'मक्का डिफेंस पैक्ट' की खबरें सामने आईं, ईरान के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया। ईरान की संसद और राष्ट्रीय सुरक्षा व विदेश नीति आयोग के वरिष्ठ सदस्य इब्राहिम रेज़ाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सऊदी अरब पर करारा हमला बोला।
इब्राहिम रेज़ाई ने लिखा, *"सऊदी अरब को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि तुर्की और पाकिस्तान के साथ कागज़ी समझौते करने से उन्हें सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी। ठीक उसी तरह, जैसे दशकों तक अमेरिकियों का एकतरफा साथ देने के बावजूद वे खुद को सुरक्षित नहीं कर पाए।"* ईरानी सांसद ने आगे दावा किया कि यदि सऊदी अपनी नीतियों और क्षेत्रीय दृष्टिकोण में सुधार करे, तो उसे दूसरों से सुरक्षा के लिए "भीख" मांगने की नौबत नहीं आएगी।
लाल सागर से होर्मुज तक मंडराता ख़तरा: क्यों मजबूर हुआ सऊदी?
दरअसल, यह नया सुरक्षा गठबंधन अकारण नहीं बना है। पिछले कुछ वर्षों में ईरान समर्थित यमनी हूथी विद्रोहियों और इराकी मिलिशिया द्वारा सऊदी अरब के अहम बुनियादी ढांचों और प्रमुख तेल सुविधाओं पर लगातार ड्रोन व मिसाइल हमले किए गए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण संघर्ष की आंच में पूरा खाड़ी क्षेत्र अनचाहे तौर पर झुलस रहा है। वैश्विक तेल आपूर्ति का केंद्र माने जाने वाले समुद्री रास्तों में लगातार हो रही बाधाओं के कारण सऊदी अरब अमेरिका पर अपनी रणनीतिक निर्भरता कम करते हुए अपनी रक्षा साझेदारियों का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहा था।

क्या त्रिकोणीय गठबंधन से बदलेगा मिडिल ईस्ट का नक्शा?
सऊदी अरब के पास अथाह वित्तीय ताकत, तुर्की के पास नाटो (NATO) स्तर की आधुनिक सेना और पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता तथा विशाल सैन्य बल है। इन तीनों शक्तियों के एकजुट होने से क्षेत्र का शक्ति संतुलन काफी हद तक बदल सकता है। हालांकि, ईरान के कड़े बयानों ने यह साफ कर दिया है कि वह इस गठबंधन को अपने लिए एक सीधे खतरे और क्षेत्रीय घेराबंदी के रूप में देख रहा है। ईरान की इस चेतावनी के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह नया सुरक्षा समझौता खाड़ी में शांति लाएगा या फिर एक नए और भयानक सैन्य टकराव को जन्म देगा।
मक्का में हुई अहम मुलाकात
समझौते पर सऊदी अरब में हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान हस्ताक्षर किए गए। इसमें सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ शामिल हुए। मक्का में हुआ यह समझौता ऐसे समय आया है जब मध्य पूर्व में सुरक्षा हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव का असर खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और समुद्री व्यापार पर भी पड़ा है।


