परंपरा: वो कौन-सी सब्जी है जिसे सिर्फ खाया ही नहीं जाता बल्कि उसकी बलि भी दी जाती है?

| Nov 30 2022, 03:24 PM IST

परंपरा: वो कौन-सी सब्जी है जिसे सिर्फ खाया ही नहीं जाता बल्कि उसकी बलि भी दी जाती है?
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सार

Hindu Traditions: आमतौर पर सब्जी का उपयोग खाने के लिए किया जाता है। लेकिन कुछ सब्जियों का उपयोग पूजा-पाठ व तंत्र-मंत्र आदि में भी किया जाता है। ऐसी ही एक सब्जी है कद्दू, जिसे कुछ जगहों पर भोपला और कुम्हडा भी कहा जाता है।
 

उज्जैन. हिंदू धर्म में बलि देने की परंपरा सालों से चली आ रही है। मान्यताओं (Hindu Traditions) के अनुसार, कहीं बकरे की बलि चढ़ाई जाती है तो कहीं मुर्गे और भैंसे की। इन्हें तामसिक बलि कहा जाता है, जिसमें किसी पशु की बलि दी जाती है। हिंदू धर्म में सात्विक बलि देने का विधान भी है, इसके लिए कद्दू का उपयोग किया जाता है। कद्दू एक साधारण सब्जी है, लेकिन कुछ स्थानों पर इसका उपयोग बलि देने के लिए किया जाता है। कद्दू से जुड़ी (Hindu beliefs related to pumpkin) कई मान्यताएं और परंपराएं भी हैं। आज हम आपको इन्हीं के बारे में बता रहे हैं…

भूरे कद्दू की दी जाती है बलि
बलि देने के लिए पीले नहीं बल्कि भूरे कद्दू का उपयोग किया जाता है। ये कद्दू के पकने से पहले की अवस्था होती है। देश के कई हिस्सों में कद्दू की बलि देने की परंपरा है। अनेक देवी मंदिरों में नवरात्रि के दौरान कद्दू की बलि मुख्य रूप से दी जाती है। कद्दू की बलि पशु बलि के समान ही फल देने वाली मानी गई है। देवी कूष्मांडा को कद्दू की बलि देने से हर परेशानी दूर हो सकती है, ऐसी मान्यता है।

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यहां महिलाओं द्वारा कद्दू काटना प्रतिबंधित?
देश के कुछ आदिवासी इलाकों जैसे बस्तर में एक अजीब परंपरा है, यहां महिलाएं का कद्दू काटना प्रतिबंधित है। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार, कद्दू परिवार का बड़ा बेटा होता है, इसका काटना बेटे की बलि देने जैसा माना गया है। अगर कद्दू काटना होता है तो ये काम पुरुष करते हैं न कि महिलाएं। कद्दू को कभी अकेला नहीं काटा जाता, इसके साथ कोई और सब्जी भी काटी जाती है। ये आदिवासी परंपरां सालों से चली आ रही हैं।

विदेश में कद्दू से बनाते हैं डरावना हैलोवीन
पश्चिमी देशों में हैलोवीन नाम का एक त्योहार मनाया जाता है। ये त्योहार पूर्वजों से संबंधित है। इस त्योहार में कद्दू को अंदर से खोखला करने के बाद इस पर आंख और मुंह की डरावनी आकृति बनाई जाती है और इसे घर के बाहर लटकाया जाता है। इन्हें पूर्वजों का प्रतीक माना जाता है। फेस्टिवल खत्म होने के बाद इन्हें जमीन में दफना दिया जाता है।


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