कालभैरव अष्टमी 19 नवंबर को : इस विधि से करें इनकी पूजा, चढ़ाएं नीले फूल और लगाएं सरसो के तेल का दीपक

Published : Nov 18, 2019, 10:44 AM IST
कालभैरव अष्टमी 19 नवंबर को : इस विधि से करें इनकी पूजा, चढ़ाएं नीले फूल और लगाएं सरसो के तेल का दीपक

सार

मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालभैरव अष्टमी कहते हैं। इस दिन भगवान कालभैरव की पूजा की जाती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव ने इसी दिन कालभैरव अवतार लिया था। 

उज्जैन. इस बार कालभैरव अष्टमी 19 नवंबर, मंगलवार को है। इस दिन भगवान कालभैरव की विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों को सभी सुखों की प्राप्ति होती है।

इस विधि से करें भगवान कालभैरव की पूजा
कालभैरव अष्टमी की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद समीप स्थित किसी भैरव मंदिर में जाएं। अबीर, गुलाल, चावल, फूल, सिंदूर आदि चढ़ाकर कालभैरव की पूजा करें।
नीले फूल चढ़ाने से विशेष लाभ मिलता है। भगवान को भोग के रूप में दही के साथ उड़द के बड़े अर्पित करें। मिठाई का प्रसाद भी चढ़ाएं। सरसो के तेल का दीपक लगाएं। मंदिर में ही बैठकर श्रीकालभैरवाष्टकम का पाठ करें।
भैरवजी का वाहन कुत्ता है, अत: इस दिन कुत्तों को भी मिठाई खिलाएं। इस प्रकार भगवान कालभैरव का पूजन करने से साधक की हर मनोकामना पूरी हो सकती है।

कालभैरवाष्टकम्
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपंकजं। व्यालयज्ञसूत्रमिंदुशेखरं कृपाकरम्॥
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबर। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥1॥
भानुकोटिभास्वरं भावाब्धितारकं परं। नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्॥
कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥2॥
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं। श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्॥
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रतांडवप्रियं। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥3॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तलोकविग्रहं। भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहं।
विनिक्कणन्मनोज्ञहेमकिंकिणीलसत्कटिं। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥4॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं। कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुं॥
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥5॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं। नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम्॥
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥6॥
अट्टाहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं। दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनं॥
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥7॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं। काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुं॥
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं। काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥8॥
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं। ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनं॥
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनम्। प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधि ध्रूवम॥9॥

कालभैरव के साथ करें देवी कालिका की पूजा
कालभैरव अष्टमी पर भगवान कालभैरव के साथ देवी कालिका की पूजा और व्रत का विधान है। देवी काली की उपासना करने वालों को आधी रात के बाद मां की वैसे ही पूजा करनी चाहिए जैसे दुर्गा पूजा में सप्तमी को देवी कालरात्रि की पूजा होती है।
माता दुर्गा के विभिन्न रूपों के चित्रों में शेर सवार माता के आगे एक ओर हनुमानजी और दूसरी ओर भैरव होते हैं। वास्तव में भैरवजी और हनुमानजी वीर शक्तियां हैं। जब-जब माता दैत्यों का वध करती हैं वीर भैरव और हनुमानजी इन दैत्यों पर अपनी संपूर्ण शक्ति से घात करते हैं।

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