आखिर क्यों ग्रहण के दौरान भोजन और जल में डाला जाता है तुलसी पत्र?

Published : Sep 18, 2024, 03:41 PM IST
why tulsi patra added in foods during grahan

सार

ग्रहण के दौरान भोजन और जल में तुलसी पत्र डालने की परंपरा धार्मिक मान्यताओं से लेकर वैज्ञानिक कारणों तक, कई पहलुओं से जुड़ी है। तुलसी के पत्ते में मौजूद एंटीबैक्टीरियल गुण भोजन को सुरक्षित रखते हैं और नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाते हैं।  

ग्रहण के दौरान भोजन और जल में तुलसी पत्र डालने की परंपरा का संबंध धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक मान्यताओं से परिपूर्ण है। इस प्राचीन प्रथा को भारत में विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके पीछे कई धार्मिक, अध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण हैं जो स्वास्थ्य, धर्म और आध्यात्मिकता से जुड़े हुआ है।  ग्रहण के दौरान भोजन और जल में तुलसी पत्र डालने की परंपरा न केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित है, बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक तर्क भी मौजूद हैं। तुलसी के पत्ते में मौजूद गुण भोजन और पानी को नकारात्मक ऊर्जा और हानिकारक जीवाणुओं से बचाते हैं। यही कारण है कि यह प्रथा आज भी लोगों के बीच इतनी प्रचलित है। इस लेख में हम हमारे एस्ट्रो एक्सपर्ट शिवम पाठक से ग्रहण के दौरान भोजन में तुलस पत्र रखने के फायदे के बारे में विस्तार से जानेंगे।

ग्रहण के दौरान भोजन में क्यों रखते हैं तुलसी पत्र

1. धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएँ:

शास्त्रीय कारण: हिंदू धर्म में ग्रहण को एक अशुभ घटना माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के समय राहु और केतु जैसे ग्रहों का प्रभाव बढ़ जाता है, जो वातावरण को नकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। इसी कारण, इस समय तैयार भोजन और पात्र में भरे हुए जल को दूषित और अशुद्ध माना जाता है। तुलसी के पौधे को पवित्र और भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है। तुलसी पत्र को ग्रहण के दौरान भोजन और जल में डालने से माना जाता है कि नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव भोजन और जल में कम हो जाता है।

तुलसी पत्र का महत्व:

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु के चरणों से तुलसी का जन्म हुआ था और इसलिए इसे पवित्र और शुद्धता का प्रतीक माना गया है। धार्मिक दृष्टि से तुलसी पत्र भोजन को शुद्ध बनाए रखता है और इसे ग्रहण के दौरान भी इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।

2. वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण:

बैक्टीरिया और कीटाणुओं से सुरक्षा:

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करें तो तुलसी में एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल और एंटीवायरल गुण होते हैं, जो भोजन और पानी को शुद्ध करने में सहायक होते हैं। ग्रहण के दौरान सूरज और चाँद की रोशनी में बदलाव के कारण वातावरण में बैक्टीरिया और कीटाणुओं की संख्या बढ़ सकती है, जिससे भोजन और पानी दूषित हो सकता है। तुलसी के पत्ते में मौजूद तत्व इन बैक्टीरिया और कीटाणुओं के असर को कम करने में मदद करते हैं। इसलिए भोजन और जल में तुलसी पत्र रखा जाता है।

अल्ट्रावायलेट किरणों का प्रभाव:

ग्रहण के दौरान सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणों का सीधा असर पृथ्वी पर पड़ता है, जिससे वातावरण में नकारात्मक प्रभाव बढ़ सकता है। तुलसी के पत्तों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और अन्य प्राकृतिक रसायन इन यूवी किरणों के प्रभाव को न्यूट्रलाइज कर सकते हैं, जिससे भोजन और जल सुरक्षित रहते हैं।

ऊर्जा संतुलन:

आयुर्वेद के अनुसार, ग्रहण के दौरान पृथ्वी के चुम्बकीय और गुरुत्वाकर्षण बल में परिवर्तन होता है, जो पर्यावरण को असंतुलित करता है। तुलसी के पत्तों में मौजूद विशेष दर्जा इस असंतूलन को सुधारने में मदद करती हैं।

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3. भोजन की सुरक्षा:

खराब होने से बचाना:

ग्रहण के दौरान भोजन की जल्दी खराब होने की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि वैज्ञानिक रूप से माना जाता है कि इस समय वायुमंडल में बैक्टीरिया और फंगस की सक्रियता बढ़ जाती है। तुलसी के पत्तों को भोजन में डालने से उसके नेचुरल एंटी-बैक्टीरियल गुण भोजन को सुरक्षित रखते हैं और उसे जल्दी खराब होने से बचाते हैं।

जल को शुद्ध करना:

तुलसी के पत्तों को पानी में डालने से वह शुद्ध होता है और ग्रहण के समय उसमें किसी भी प्रकार के हानिकारक तत्वों का असर कम हो जाता है। तुलसी का जल पाचन तंत्र के लिए भी फायदेमंद होता है और शरीर को रोगाणुओं से बचाता है।

4. मानसिक और आध्यात्मिक शांति:

ग्रहण को एक आध्यात्मिक घटना के रूप में भी देखा जाता है। माना जाता है कि ग्रहण के दौरान तुलसी पत्र का सेवन या उसका उपयोग करने से मन और शरीर शुद्ध होते हैं। यह व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है और मानसिक शांति प्रदान करता है। तुलसी को ग्रहण के समय भोजन और जल में डालने से उसमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे उस समय के दौरान उत्पन्न होने वाली अशांति कम होती है।

5. परंपरा और सामाजिक मान्यताएँ:

सांस्कृतिक महत्व: ग्रहण के दौरान किसी भी प्रकार का भोजन या जल ग्रहण नहीं करने की परंपरा भी प्राचीन काल से चली आ रही है। ग्रहण के समय भोजन और जल को दूषित माना जाता है। अगर भोजन को सुरक्षित रखना आवश्यक हो, तो उसमें तुलसी पत्र डालने की सलाह दी जाती है ताकि इसे ग्रहण के नकारात्मक प्रभाव से बचाया जा सके।

संस्कार और आस्था: 

यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, और समाज में इसे एक आस्था का रूप दिया गया है। लोग इसे न केवल वैज्ञानिक कारणों से बल्कि अपने पूर्वजों की आस्था और विश्वास को बनाए रखने के लिए भी भोजन में तुलसी पत्र डालते हैं।

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