महाभारत के अनुसार जब पांडवों ने इंद्रप्रस्थ बसाया तो उसमें एक दिव्य महल था। उस महल में कुछ ऐसी विशेषताएं थीं जो देवराज इंद्र के महल में भी नहीं थी। बहुत कम लोगों को ये पता है कि वो महल किस राक्षस ने बनाया था।
महाभारत में अनेक रोचक कथाएं हैं, इनमें से कुछ के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। ये बात तो सभी जानते हैं कि पांडवों ने इंद्रप्रस्थ नाम का अपना एक अलग राज्य बसाया था, मगर उस राज्य में जो दिव्य महल था, वो किसने बनाया था, ये बहुत कम लोग जानते हैं। महाभारत के अनुसार, ये दिव्य महल एक राक्षस ने बनाया था। जानें कौन था वो राक्षस और उसने क्यों बनाया पांडवों के लिए महल…
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महाभारत के अनुसार, पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ में दिव्य महल का निर्माण मयासुर नाम के राक्षस ने किया था। ये राक्षस दैत्यों का प्रधान शिल्पी यानी इंजीनियर था। मयासुर का वर्णन अन्य धर्म ग्रंथों में भी मिलता है। मयासुर के पिता का नाम दनु था जो दैत्यों के राजा भी थे। मयासुर का विवाह हेमा नाम की अप्सरा से हुआ था, जिससे मंदोदरी का जन्म हुआ। यही मंदोदरी राक्षसराज रावण की पत्नी बनी। इस तरह मयासुर रावण का ससुर हुआ।
महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सभापर्व के अनुसार, जब अर्जुन और श्रीकृष्ण ने खांडव वन जलाया तो वहां पर मयासुर भी था। अग्नि के भय से जब मयासुर अपनी जान बचाकर भागा तो श्रीकृष्ण ने उसका वध करना चाहा लेकिन वह अर्जुन की शरण में चला गया। बाद में श्रीकृष्ण के कहने पर ही मयासुर ने पांडवों के लिए एक दिव्य महल मनाया, जिसे मायासभा का नाम दिया। युधिष्ठिर का ये महल देवताओं से भी बढ़कर था।
मयासुर ने ही भीमसेन को कौमुदि नाम की दिव्य गदा दी थी, जिस पर कीमती रत्न लगे हुए थे। इसके अलावा अर्जुन को देवदत्त नाम का शंख भी मयासुर ने ही दिया था, जिसकी आवाज सुनकर शत्रु भयसे कांपने लगे थे। मयासुर ने ही उस महल की रक्षा के लिए किंकर नाम के 8 हजार राक्षसों को वहां नियुक्त किया था।
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