Ekdant Sankashti Chaturthi Vrat Katha: इस बार ज्येष्ठ मास की संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 मई, मंगलवार को किया जाएगा। इसे एकदंत संकष्टी चतुर्थी भी कहते हैं। इस व्रत की कथा सुने बिना इसका पूरा फल नहीं मिलता।
Ekdant Sankashti Vrat Katha In Hindi: हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए व्रत किया जाता है। इसे संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। हर संकष्टी चतुर्थी का एक विशेष नाम भी होता है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को एकदंत संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इसे बार एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 मई, मंगलवार को किया जाएगा। इससे जुड़ी एक रोचक कथा भी है, जिसे सुनने के बाद ही इस व्रत का पूरा फल मिलता है। आगे पढ़िए एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा…
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एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
सतयुग में पृथु नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में एक दयादेव नाम का एक वेदज्ञ ब्राह्मण रहता था। उनके चार पुत्र थे। समय आने वाले दयादेव ने उन चारों का विवाह करवा दिया। दयादेव की बड़ी बहू भगवान श्रीगणेश की परम भक्त थी और वह बचपन से ही संकटनाशन गणेश चतुर्थी का व्रत करती थी।
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विवाह के बाद बड़ी बहू ने वहां भी व्रत करने के लिए अपने ससुर से अनुमति मांगी लेकिन उन्होंने इसके लिए मना कर दिया लेकिन फिर भी बड़ी बहू चुपचाप चतुर्थी व्रत करने लगी। कुछ समय बाद बड़ी बहू ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। बालक के जन्म के बाद सास द्वारा चतुर्थी व्रत का विरोध किया जाने लगा।
विवश होकर बड़ी बहू ने संकष्टी चतुर्थी व्रत का त्याग कर दिया, जिससे भगवान श्रीगणेश नाराज हो गए। बड़ी बहु का पुत्र जब युवा हुआ तो एक सुयोग्य कन्या से उसका विवाह करवा दिया। विवाह के बाद एक दिन श्रीगणेश जी ने बड़ी बहु के उस पुत्र का अपहरण कर लिया। ऐसा होने पर पूरे घर-परिवार में कोहराम मच गया।
बड़ी बहु की पुत्रवधू भी यह सुनकर व्याकुल हो गई और पति की कुशलता के लिए संकटनाशन गणेश चतुर्थी का व्रत करने लगी। एक दिन एक ब्राह्मण भिक्षा मांगने उनके घर आए और भोजन की मांग की। पुत्रवधू ने ब्राह्मण का पूजन कर आसन पर बैठाया और भोजन करवाकर वस्त्र, दक्षिणा आदि चीजें प्रदान की।
प्रसन्न होकर ब्राह्मण ने कहा ‘मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूं, माँगों तुम्हें क्या चाहिये, मैं स्वयं गणेश हूं जो तुम्हारी श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर यहां आया हूं।’ श्रीगणेश की बात सुनकर नवविवाहित कन्या ने तुरंत अपने पति को सकुशल घर आने की प्रार्थना की। श्रीगणेश ने तुरंत ये वरदान उस कन्या को दे दिया।
उसी समय सोमशर्मा नाम के एक ब्राह्मण को वन में नवविवाहिता का खोया पति मिला और वो उसे नगर ले आया। अपने पोते को सकुशल देख दयादेव बहुत प्रसन्न हुआ और श्रीगणेश की भक्ति करने लगा। उस दिन ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी थी। तभी से पूरा परिवार चतुर्थी तिथि का व्रत करने लगा।
