RBI MPC Meeting: BPS क्या होता है और 25 BPS का मतलब कितने प्रतिशत होता है? आरबीआई मॉनेटरी पॉलिसी के 7 जरूरी बैंकिंग शब्दों का आसान मतलब समझिए।

RBI MPC Meeting Key Terms: आज, 7 अक्टूबर को जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा मॉनेटरी पॉलिसी का फैसला सुनाएंगे, तो हर जगह कुछ भारी-भरकम शब्द बार-बार सुनाई देंगे। जैसे 'आरबीआई ने 25 BPS की बढ़ोतरी की', 'MPC का फैसला आया' या 'हॉकिश रुख अपनाया गया।' ज्यादातर लोग इन टेक्निकल शब्दों के चक्कर में उलझ जाते हैं और समझ नहीं पाते कि इसका उनकी जेब या लोन की EMI पर क्या असर पड़ेगा? अगर आप भी खबरों में आने वाले इन शब्दों को सुनकर कन्फ्यूज हो जाते हैं, तो आइए बिल्कुल सिंपल और बोलचाल भाषा में समझते हैं बैंकिंग और मॉनेटरी पॉलिसी से जुड़े 7 सबसे जरूरी शब्दों के मतलब...

BPS क्या है और 25 BPS का मतलब कितना?

बैंकिंग और शेयर बाजार में ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव को मापने के लिए BPS (Basis Points) का इस्तेमाल किया जाता है। इसे आप प्रतिशत (Percentage) का छोटा हिस्सा समझ सकते हैं। 100 BPS का मतलब 1% (एक प्रतिशत) होता है। यानी 1 BPS में 0.01% होता है। मान लीजिए खबर आती है कि आरबीआई ने रेपो रेट में 25 BPS का बदलाव किया है, तो इसका मतलब है कि रेट्स 0.25% बदली हैं। अगर कहा जाए कि 50 BPS की कटौती हुई, तो इसका मतलब दरें 0.50% कम हो गईं।

बैंक BPS शब्द क्यों इस्तेमाल करते हैं?

अगर कोई कहे कि ब्याज दर 5% से बढ़कर 5.25% हो गई, तो आम बोलचाल में लोग कह देते हैं कि ब्याज '0.25% बढ़ गया'। लेकिन गणित के हिसाब से 5 का 0.25% अलग होता है। किसी भी तरह के भ्रम से बचने के लिए दुनियाभर के वित्तीय संस्थान हमेशा 'बेसिस पॉइंट्स' (BPS) में बात करते हैं।

MPC का मतलब क्या होता है?

MPC (Monetary Policy Committee) को हिंदी में मौद्रिक नीति समिति कहते हैं। ये 6 सदस्यों वाली एक खास टीम होती है, जिसमें तीन सदस्य रिजर्व बैंक के और तीन सदस्य भारत सरकार द्वारा चुने गए बाहरी आर्थिक विशेषज्ञ होते हैं। इनका मुख्य काम ये तय करना कि देश में महंगाई काबू में रहे और आर्थिक विकास की रफ्तार न थमे। हर दो महीने में ये समिति 3 दिन तक देश-दुनिया के हालात, कच्चे तेल की कीमतों और महंगाई पर मंथन करती है और फिर तय करती है कि ब्याज दरें बढ़ेंगी, घटेंगी या स्थिर रहेंगी।

मॉनेटरी टाइटनिंग (Monetary Tightening)

जब बाजार में चीजें तेजी से महंगी होने लगती हैं (जैसे इस समय कच्चा तेल $98 के आसपास बना हुआ है), तो लोग ज्यादा खरीदारी न करें और मांग थोड़ी कम हो, इसके लिए आरबीआई पैसे का बहाव रोकने की कोशिश करता है। इस नीति को 'मॉनिटरी टाइटनिंग' या सख्त मौद्रिक नीति कहा जाता है। इसके तहत आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाता है, ताकि लोन महंगे हों, लोग गैर-जरूरी खर्च टालें और महंगाई नीचे आए।

रेपो रेट क्या होता है?

अब आते हैं उस शब्द पर जिसका इस्तेमाल RBI की हर MPC बैठक में सबसे ज्यादा होता है, रेपो रेट (Repo Rate)। आसान भाषा में समझें तो रेपो रेट वो ब्याज दर है जिस पर RBI दूसरे बैंकों को कम समय के लिए पैसा देता है। जब बैंकों को पैसों की जरूरत होती है तो वे RBI से पैसा ले सकते हैं। इस पैसे पर बैंक को जो ब्याज देना पड़ता है, उसमें रेपो रेट की बड़ी भूमिका होती है। इसका आम आदमी से कनेक्शन समझें, तो अगर RBI रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों के लिए पैसा महंगा होने का दबाव बन सकता है। बैंक इसका असर अपने लोन की ब्याज दरों पर डाल सकते हैं। ऐसे में फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, कार लोन या दूसरे कर्ज की EMI बढ़ने की संभावना रहती है। वहीं रेपो रेट घटने पर बैंकों के लिए कर्ज की लागत कम होने की गुंजाइश बनती है और कुछ लोन सस्ते हो सकते हैं। हालांकि हर बार रेपो रेट में बदलाव का मतलब ये नहीं होता कि आपकी EMI उसी समय और उसी अनुपात में बदल जाएगी। इसका असर आपके लोन के बेंचमार्क और बैंक की शर्तों पर निर्भर करता है।

इंफ्लेशन (Inflation)

इंफ्लेशन यानी महंगाई का मतलब समय के साथ सामान और सेवाओं की कीमतों का बढ़ना है। मान लीजिए आज किसी सामान की कीमत 100 रुपए है और कुछ समय बाद उसी सामान के लिए 105 रुपए देने पड़ रहे हैं। कीमत में इस तरह की बढ़ोतरी महंगाई के असर को दिखाती है। RBI के लिए महंगाई बहुत अहम होती है, क्योंकि उसका काम सिर्फ ब्याज दर तय करना नहीं है। उसे महंगाई और आर्थिक ग्रोथ के बीच बैलेंस भी देखना होता है। जब महंगाई ज्यादा बढ़ने का खतरा होता है तो ब्याज दर बढ़ाने जैसे कदम पर विचार किया जा सकता है। इससे कर्ज महंगा हो सकता है और बाजार में खर्च की रफ्तार पर असर पड़ सकता है। वहीं अगर महंगाई काबू में हो और अर्थव्यवस्था को ज्यादा सपोर्ट की जरूरत हो तो ब्याज दर कम करने की गुंजाइश बन सकती है।

लिक्विडिटी (Liquidity)

साधारण शब्दों में लिक्विडिटी का मतलब 'बाजार में पैसों की मौजूदगी' या कैश का फ्लो है। जब बैंकों के पास कर्ज बांटने के लिए बहुत सारा पैसा मौजूद होता है और लोग आसानी से लोन ले रहे होते हैं, तो उसे हाई लिक्विडिटी कहा जाता है। वहीं, जब बाजार में कैश की तंगी होती है और बैंकों के पास कर्ज देने के लिए फंड सीमित हो जाता है, तो उसे टाइट लिक्विडिटी कहते हैं।

हॉकिश और डोविश रुख

हॉकिश (Hawkish)

आरबीआई गवर्नर के बयानों में अक्सर ये दो शब्द सुनने को मिलते हैं। हॉकिश का मतलब बाज की तरह नजर रखना। जब आरबीआई का पूरा फोकस सिर्फ और सिर्फ महंगाई को नीचे लाने पर होता है और वो ब्याज दरें बढ़ाने के मूड में रहता है, तो उसे 'हॉकिश स्टांस' कहते हैं।

डोविश (Dovish)

फाख्ता यानी कबूतर की तरह शांत। जब मंदी का डर हो और आरबीआई का मकसद देश के कारोबारियों को सस्ता लोन देकर विकास को रफ्तार देना हो, तो वो दरें घटाता है। इसे 'डोविश स्टांस' कहते हैं।