बेंगलुरु की एक महिला ने 10.5 लाख की ऑफिस जॉब के बजाय 8.5 लाख की WFH नौकरी चुनी। उसने यात्रा खर्च, ट्रैफिक और तनाव से बचने के लिए यह फैसला किया। यह किस्सा वर्क-लाइफ बैलेंस के महत्व और WFH की बढ़ती मांग को दर्शाता है।

कोरोना के बाद से 'वर्क फ्रॉम होम' को लेकर एक नई बहस छिड़ी हुई है। कंपनियां चाहती हैं कि कर्मचारी ऑफिस लौटें, जबकि ज़्यादातर कर्मचारी घर से काम करने के पक्ष में हैं। लंबी ट्रैवलिंग, कैब का रोज़ का खर्चा और ऑफिस से जुड़े दूसरे खर्चों का हवाला देकर लोग सोशल मीडिया पर वर्क फ्रॉम होम की मांग कर रहे हैं। इसी बीच, एक लड़की का किस्सा वायरल हो गया है, जिसने 10।5 लाख की सालाना सैलरी वाली नौकरी छोड़कर कम पैसे वाली वर्क फ्रॉम होम जॉब चुन ली।

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ऑफिस नहीं, कम सैलरी पर घर से काम चलेगा!

बेंगलुरु में काम करने वाली एक प्रोफेशनल लड़की ने जब ज़्यादा सैलरी वाली ऑफिस जॉब के बजाय कम सैलरी वाली रिमोट जॉब चुनी, तो सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। लोग पूछने लगे कि पैसा ज़्यादा ज़रूरी है या घर पर बैठकर काम करने का सुकून? ये कहानी है पटना की रहने वाली 24 साल की शिखा प्रियदर्शिनी की। उनकी कंपनी ने हफ्ते में 5 दिन ऑफिस आना अनिवार्य कर दिया, जिसके बाद शिखा ने यह बड़ा फैसला लिया।

कंपनी ने उन्हें दो ऑप्शन दिए थे। अगर वो ऑफिस आकर काम करती हैं, तो सालाना सैलरी 10।5 लाख रुपए होगी। लेकिन अगर वो घर से काम करना चाहती हैं, तो सैलरी 8।5 लाख रुपए मिलेगी। शिखा ने पांच दिन ऑफिस जाकर देखा और उन्हें समझ आ गया कि सिर्फ 2 लाख रुपए ज़्यादा कमाने के लिए वो क्या-क्या खो रही हैं।

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कम सैलरी = ज़्यादा आज़ादी !

शिखा ने हिसाब लगाया। ऑफिस जाकर काम करने पर महीने के करीब 15,000 रुपए ज़्यादा मिलते। लेकिन इसके बदले रोज़ 30 किलोमीटर दूर ऑफिस जाना पड़ता, वो भी बेंगलुरु के भयंकर ट्रैफिक में! इसके अलावा, कैब का किराया, बाहर का खाना और दूसरे छोटे-मोटे खर्चे मिलाकर महीने का 15,000 से ज़्यादा का बिल बैठ रहा था। साथ में घंटों की एनर्जी और दिमागी स्ट्रेस, वो अलग। जब 24 साल की शिखा को समझ आया कि ऑफिस जाने से ज़्यादा फायदेमंद तो घर पर रहना है, तो उन्होंने एक पल भी नहीं सोचा। उन्होंने ऑफिस जॉब की जगह 'रिमोट इम्प्लीमेंटेशन एडवाइजर' का रोल चुन लिया।

अब उनके हर दिन कई घंटे बचते हैं। स्ट्रेस बहुत कम है और पैसे की भी बचत हो रही है। कुल मिलाकर, उन्हें एक बेहतरीन वर्क-लाइफ बैलेंस मिल गया है। सैलरी थोड़ी कम सही, लेकिन परिवार और दोस्तों के साथ बिताने के लिए ज़्यादा समय तो मिल रहा है। शिखा ने इसका एक फॉर्मूला भी बना लिया: कम सैलरी = ज़्यादा आज़ादी! उनका यह किस्सा सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो गया। ज़्यादातर लोगों ने शिखा के फैसले को सही ठहराया। कई यूज़र्स ने लिखा कि लोग अक्सर ज़्यादा सैलरी के चक्कर में ऑफिस तो चुन लेते हैं, लेकिन परिवार के साथ बिताने वाले कीमती पल और मानसिक शांति खो देते हैं।