जावेद अख्तर ने 9वें अजंता-एलोरा अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में कहा कि भारत की आत्मा अमर है। मुट्ठी भर लोग देश की प्राचीन संस्कृति को नहीं बदल सकते। 

छत्रपति संभाजीनगर। 9वें अजंता-एलोरा अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में पद्म भूषण जावेद अख्तर ने कहा कि भारत की आत्मा अमर है। इसे घटनाओं का कोई भी अस्थायी मोड़ नष्ट नहीं कर सकता। कुछ चुनाव और मुट्ठी भर लोग देश की प्राचीन संस्कृति को नहीं बदल सकते। यह हिंदुस्तान की सच्ची भावना है।

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फिल्म महोत्सव में फिल्म निर्देशक जयप्रद देसाई के साथ बातचीत में जावेद अख्तर ने कहा कि 60 के दशक की फिल्मों के नायक साधारण पृष्ठभूमि से आते थे। तब के हीरो टैक्सी ड्राइवर, रिक्शा ड्राइवर, मजदूर या शिक्षक होते थे। आजकल तस्वीर बदल गई है। अब हीरो अमीर परिवारों से होते हैं। उन्हें देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है। यही वजह है कि आज की फिल्में राजनीतिक विषयों या यहां तक कि सामाजिक मुद्दों की भी बात नहीं करती। आज फिल्में सिर्फ व्यक्तिगत कहानियों पर बन रहीं हैं।

व्यक्ति को उसकी भाषा के काटना पेड़ की जड़ों को काटने जैसा
बातचीत के दौरान जावेद अख्तर ने कहा कि भाषा सिर्फ संचार का साधन नहीं है। यह किसी नदी की तरह है जिसकी पानी संस्कृति है। किसी व्यक्ति को उसकी भाषा से काटना ऐसा है जैसे पेड़ की जड़ों को काट दिया जाए। यदि हम अपनी भाषा खो देते हैं तो हम अपनी संस्कृति और अपनी कहानियां भी खो देते हैं। दुर्भाग्य से आज जो लोग किसी भाषा के महत्व को नहीं समझते वे इसके बारे में फैसले ले रहे हैं।

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अजंता-एलोरा की गुफाओं के बारे में जावेद अख्तर ने कहा, "मैं एलोरा गुफाओं की शानदार मूर्तियों को देखकर बहुत प्रभावित हुआ हूं। मुझे बहुत अफसोस है कि मैं इसे पहले देखने क्यों नहीं आया। जिन लोगों ने कला के इस मंत्रमुग्ध कर देने वाले नमूने को बनाया है, उन्होंने इसे पैसे के लिए नहीं बल्कि जुनून के कारण बनाया है। अगर हम उनके जुनून का हजारवां हिस्सा भी आत्मसात कर सकें तो देश को स्वर्ग में बदल देंगे।"

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