डॉग लवर हैं तो 'ओह माय डॉग' आपका दिल जीत सकती है। ऑस्कर नाम का डॉग पूरी फिल्म का असली हीरो बनकर उभरता है। भावनाएं, थ्रिल और सोशल मैसेज के बावजूद लंबाई इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।
डायरेक्टर अमित राय की 'ओह माय डॉग' एक ऐसी फिल्म है, जिसमें इंसानों से ज्यादा एक डॉग आपका दिल जीत लेता है। ऑस्कर नाम का यह चार पैरों वाला हीरो पूरी कहानी को अपने कंधों पर उठाकर चलता है। फिल्म सिर्फ इमोशनल जर्नी नहीं, बल्कि किडनैपिंग, चाइल्ड लेबर, किडनी रैकेट, भ्रष्टाचार और इंसान व जानवर के रिश्ते जैसे गंभीर मुद्दों को भी छूती है। हालांकि करीब ढाई घंटे की लंबाई कई जगह इसकी रफ्तार धीमी कर देती है। मजबूत परफॉर्मेंस, शानदार डॉग एक्टिंग और दिल छू लेने वाले पलों के दम पर यह फिल्म खास बनती है।
क्या है 'ओह माय डॉग' की कहानी?
फिल्म की शुरुआत पुलिस के बहादुर डॉग सेनापति के अंतिम संस्कार से होती है। इसके बाद कहानी उसके दो बेटों ऑस्कर और मोमो की जिंदगी पर पहुंचती है, जो अलग-अलग राज्यों में पल रहे हैं। मोमो को एक प्यार करने वाला परिवार मिलता है, जबकि ऑस्कर मजदूर प्रिंस के साथ रहता है। कहानी तब रोमांचक हो जाती है, जब मोमो का अपहरण हो जाता है और प्रिंस भी लापता हो जाता है। एक तरफ छोटा बच्चा अपने डॉग को खोजता है, तो दूसरी तरफ डॉग अपने मालिक को तलाशने निकल पड़ता है। इसी सफर में फिल्म कई सामाजिक मुद्दों से दर्शकों का सामना कराती है।
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'ओह माय डॉग' की स्टार कास्ट की परफॉर्मेंस कैसी है?
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत ऑस्कर है। वह सिर्फ डॉग नहीं, बल्कि पूरी फिल्म का सबसे प्रभावशाली कलाकार बनकर सामने आता है। उसके एक्सप्रेशन, एक्शन और इमोशनल सीन याद रह जाते हैं। डेब्यू कर रहे माही राय (अपु) आत्मविश्वास से भरे नजर आते हैं। हालांकि कई जगह उनका किरदार जरूरत से ज्यादा ओवर-स्मार्ट दिखता है। राजेश कुमार बिहारी पुलिस अफसर के रोल में शानदार हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज और बोली किरदार को पूरी तरह वास्तविक बनाती है। पंकज त्रिपाठी हमेशा की तरह सहज और भरोसेमंद लगते हैं। वहीं पवन मल्होत्रा का ऊंची आवाज वाला किरदार कुछ समय बाद थकाने लगता है।

अमित राय का डायरेक्शन कैसा है?
अमित राय ने एक डॉग को कहानी का असली हीरो बनाकर बड़ा जोखिम लिया और काफी हद तक इसमें सफल भी रहे। फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि डॉग मीट तस्करी, बाल मजदूरी, गरीब मजदूरों के साथ धोखाधड़ी और भ्रष्ट व्यवस्था जैसे मुद्दों पर भी सोचने को मजबूर करती है।हालांकि स्क्रीनप्ले को और टाइट रखा जा सकता था। कई चेज़ सीक्वेंस जरूरत से ज्यादा लंबे महसूस होते हैं।
'ओह माय डॉग' का म्यूजिक और टेक्निकल फ्रंट कैसा है?
फिल्म का म्यूजिक ज्यादा असर नहीं छोड़ता। कोई ऐसा गाना नहीं है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद याद रहे। हालांकि बैकग्राउंड स्कोर कई इमोशनल और थ्रिल वाले सीन्स में अच्छा माहौल बनाता है।लोकेशन, सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिजाइन कहानी के माहौल को वास्तविक बनाते हैं। गांव, पुलिस सिस्टम और अलग-अलग राज्यों का वातावरण विश्वसनीय लगता है। एडिटिंग अगर 20-25 मिनट छोटी होती तो फिल्म ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी। विजुअल्स और डॉग ट्रेनिंग पर टीम की मेहनत साफ नजर आती है।
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क्यों देखें 'ओह माय डॉग'?
अगर आपको डॉग्स से प्यार है, इमोशनल फैमिली फिल्में पसंद हैं और सोशल मैसेज वाली कहानियां देखना अच्छा लगता है, तो यह फिल्म जरूर देखी जा सकती है। ऑस्कर अकेले ही टिकट की कीमत वसूल करा देता है। हमारी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार।
