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दिल्ली में खिलौने बेचती थीं बूढ़ी अम्मा...लॉकडाउन के बाद पैदल ही 400 किमी. दूर घर निकल पड़ीं
नई दिल्ली. कोरोना वायरस की वजह से पूरे देश में 21 दिन का लॉकडाउन घोषित किया गया था। इसके बाद से भारत के कोने-कोने में यातायात सहित बहुत सी सुविधाएं ठप्प हैं। बेसिक जरूरतों को छोड़ पूरा देश बंद है। ऐसे में घर से कोसों दूर शहरों में चार पैसे कमा रहे गरीब सड़कों पर आ गए हैं। बंदी के माहौल में न इनके पास न खाना है न पैसे तो ये पैदल ही घर निकल पड़े हैं। दिल्ली से राजस्थान निकला एक पूरा परिवार सड़क पर चलता दिखा। परिवार में एक 90 साल की बुजुर्ग महिला को पैदल 400 किमी.का सफर तय करने का जज्बा देख हर किसी की आंखें फैल गईं।
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काजोदी नाम की 90 साल से ज्यादा की ये बुजुर्ग महिला लगातार कई घंटों से सूनी सख्त सड़क पर चल रही हैं। अपने हर छोटे कदम के लिए वो खुद को एक छड़ी का सहारा दे रही हैं। शहर में खाने-पीने रहने को कुछ नहीं बचा। जिंदा रहना है तो गांव पहुंचना ही होगा। ऐसे में वो छड़ी के सहारे मजबूत इरादों से कदम बढ़ा रही हैं। जर्जर हो चुके शरीर में ताकत नहीं है लेकिन उनके हौसले पक्के हैं कि वो घर पहुंच जाएंगी।
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छड़ी के सहारे खुद को धक्का देती हुई ये बूढ़ी अम्मा जिंदगी की आस में चल रही हैं। नहीं पता और कितना चलना है। पूरा परिवार आगे चल रहा है वो बहू-बेटे के पीछे धीमे-धीमे चल रही हैं। उन्हें पता है पैरों में दर्द हो या पूरे बदन में उन्हें हर हाल में चलते रहना है।
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ये 100 से ज्यादा लोग हैं जो कोरोना के कहर से पैदल घर का सफर पूरा करने को मजबूर हैं। ये सभी लोग नोएडा सेक्टर 15 में रहते थे। सभी दिल्ली में ट्रैफिक लाइट पर खिलौने बेचते थे। कई परिवार लगभग 400 किमी दूर राजस्थान के सवाई माधोपुर में अपने गांव वापस लौट रहे हैं।
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नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे पर इन परिवारों की तस्वीर ली गई हैं। ये भारत के इतिहास में काले पन्नों में दर्ज होगा कि 2020 के हाईटेक हो चुके डिजिटल इंडिया में दिल्ली से राजस्थान घर जाने के लिए गरीब, बेसहारा मजदूर परिवार पैदल निकल पड़े थे।
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ये अपने कंधों पर अपने छोटे-छोटे बच्चों को लादकर चल रहे हैं, तो कुछ जरूरी सामान भी ले रखा है। भूखे-प्यासे ये कई-कई घंटे सिर्फ चल रहे हैं तो ज्यादा थक जाने पर कहीं आराम कर लेते हैं। खाने के नाम पर इनके पास सिर्फ बिस्किट के पैकेट्स हैं। नोएडा में रास्ते में एक ट्रैफिक कांस्टेबल ने उन्हें रोका और एक दूसरे से अलग कर दिया। कोरोना वायरस न फैले इसके लिए आगाह किया। इन लोगों में दो बच्चे हैं जो दिल्ली में माली और जनरल स्टोर में हेल्पर का काम करते थे। ये भी पैदल चल पड़े हैं।
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एक 45 वर्षीय सब्जी विक्रेता मोहम्मद शफ़ीक भी चल रहे हैं। उनके साथ प्रदीप और अशोक नाम के दो युवा लड़के थे जिनसे वो रास्ते में मिले थे। बुलंदशहर में उनके पैतृक गांव पास ही थे तो सब साथ हो लिए।
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शफीक बताते हैं कि पुलिस उन लोगों की पिटाई कर रही है थी इसलिए वो सज्बी वाले ठेले पर चल पड़े। इन लोगों ने रास्ते में चलने वाली गाडि़यों से मदद मांगी, लिफ्ट मांगी लेकिन कोई नहीं रूका।
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केंद्र सरकार द्वारा कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिए 25 मार्च से तीन सप्ताह के राष्ट्रव्यापी बंद की घोषणा की गई थी। उसके बाद से हजारों प्रवासी श्रमिक और दैनिक आय वाले शहर छोड़ रहे हैं।
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आने वाले दिनों में काम और रोटी न मिलने के डर से ये गांव बढ़ चले हैं। कोई वाहन कोई साधन नहीं है तो क्या शहर में भूखे मरेंगे इसलिए आओ गांव लौट चलों।
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