क्या पोल्लाची की 13 भाई-बहनों वाली लड़की सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकती थी? कैसे 5वीं तक पढ़ी मां ने एक जज बनने का रास्ता तय कर दिया? क्या सीमित संसाधनों और 9 महिलाओं वाले बैच ने उसे रोक नहीं पाया? आखिर कैसे ‘बार’ से सीधे ‘बेंच’ तक पहुंचकर इतिहास रच दिया गया? 

Supreme Court Women Judges Story: सालों तक, दिल्ली के कानूनी हलकों और सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में सीनियर वकील वेंकिटा सुब्रमणि मोहना को हर किसी ने एक खुशमिजाज और मुस्कुराते हुए चेहरे के रूप में देखा। लेकिन उस शालीन मुस्कान के पीछे छिपे फौलादी इरादों, कड़े संघर्षों और इतिहास रचने के गुप्त संकल्प से बहुत कम लोग वाकिफ थे। आज सीनियर वकील वी.एस. मोहना का सुप्रीम कोर्ट की जज के तौर पर प्रमोशन न केवल उनके जीवन का सर्वोच्च शिखर है, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में एक ऐसा मोड़ है जिसने दशकों पुराने रिकॉर्ड को हिलाकर रख दिया है।

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

2018 के बाद पहली बार... इतिहास ने खुद को कैसे दोहराया?

जस्टिस वी.एस. मोहना की यह नियुक्ति देश की सबसे बड़ी अदालत के इतिहास में एक मील का पत्थर है। साल 2018 में जस्टिस इंदु मल्होत्रा की ऐतिहासिक नियुक्ति के बाद, जस्टिस मोहना पूरे देश में सीधे 'बार' (वकीलों के समूह) से सुप्रीम कोर्ट की जज बनने वाली सिर्फ और सिर्फ दूसरी महिला वकील हैं। पोल्लाची जैसे एक छोटे से कारोबारी शहर से निकलकर देश के सर्वोच्च न्यायपीठ तक पहुंचने का यह सफर किसी रहस्यमयी और रोमांचक दास्तान से कम नहीं है।

13 भाई-बहनों का बड़ा परिवार और 5वीं पास मां का वो जादुई फैसला

जस्टिस मोहना का जन्म तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के पोल्लाची में एक ऐसे अनुशासित परिवार में हुआ था, जहां संसाधनों से ज्यादा मूल्यों की कीमत थी। वह अपने माता-पिता की 13 संतानों में से 11वीं संतान थीं (9 बेटियां और 4 बेटे)। उनके पिता सेना से सेवानिवृत्त होकर सरकार में कीटविज्ञानी (Entomologist) थे, जिन्होंने बच्चों में कड़ा अनुशासन भरा। लेकिन कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी मां कावेरी अम्माल ने मोहना के भविष्य की दिशा बदली। खुद सिर्फ पांचवीं क्लास तक पढ़ी होने के बावजूद, मां ने मोहना की बहस करने और पब्लिक स्पीकिंग की छिपी हुई असाधारण प्रतिभा को पहचान लिया और उन्हें उस रास्ते पर भेजा जिस पर खानदान में कभी कोई नहीं चला था—वकालत का पेशा।

किराए के कमरों से शुरू हुआ सफर... जब खुद ट्यूशन पढ़ाकर भरा हॉस्टल का खर्च

10वीं क्लास से लेकर ग्रेजुएशन तक 'नेशनल मेरिट स्कॉलरशिप' पाने वाली मोहना ने साल 1983 में भारत के पहले पांच साल के इंटीग्रेटेड B.A. LL.B. प्रोग्राम के शुरुआती बैच में दाखिला लिया। कोयंबटूर लॉ कॉलेज तब अपनी शुरुआती अवस्था में था; न बड़ी लाइब्रेरी थी और न ही खुद की कोई भव्य इमारत। कक्षाएं किराए के कमरों में चलती थीं। कुल 83 छात्रों में केवल 9 लड़कियां थीं, जिनमें से एक मोहना थीं। सूत्रों के मुताबिक, उस दौर में उन्होंने कामकाजी महिलाओं के हॉस्टल में रहकर और खुद दूसरों को प्राइवेट ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया।

सहपाठी से जज तक: 2023 और 2026 के संयोग का वो अनोखा सच

इस कहानी का सबसे दिलचस्प सस्पेंस यह है कि 1988 के उस ऐतिहासिक पहले बैच में मोहना के साथ पढ़ने वाले सहपाठियों में के.वी. विश्वनाथन भी शामिल थे। वही के.वी. विश्वनाथन जो देश के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बने और साल 2023 में सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त किए गए। आज ठीक उसी तरह, उनकी सहपाठी रहीं जस्टिस वी.एस. मोहना ने भी सीधे बार से बेंच तक का सफर तय कर देश की सर्वोच्च अदालत की कमान संभाल ली है। उनका यह सफरनामा देश की उन करोड़ों महिलाओं और युवाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा है, जो रूढ़िवादी सीमाओं को तोड़कर आसमान छूने का साहस रखते हैं।