मानसिक और शारीरिक थकान के बावजूद खुश दिखने का दिखावा 'प्लीसेंटीज्म' कहलाता है। यह वर्कप्लेस पर बढ़ती समस्या है, जो गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों का कारण बन सकती है।

What is Pleasenteeism: भागमभाग वाली जिंदगी, वर्कप्लेस से लेकर सोशल नेटवर्क के दौरान तमाम तरह के मानसिक तनाव, शारीरिक थकान, जीवन का आम हिस्सा बनता जा रहा है। तमाम बार हम खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं जब मानसिक और शारीरिक तौर पर पूरी तरह से थकान की वजह से निढाल हो चुके होते लेकिन सामाजिक जिम्मेदारियों और नौकरी की अनिवार्यता की वजह से खुद को खुश, सामान्य और फोकस्ड दिखाते हैं। तनाव और थकान के बावजूद यह दिखावा मनोविज्ञान की भाषा में 'प्लीसेंटीज्म' कहा जाता है।

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'प्लीसेंटीज्म' वह स्थिति है, जब आप कभी खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहां आप मानसिक और शारीरिक रूप से थके हुए हैं और आप वाकई काम पर या यहां तक कि काम पर भी सामाजिक रूप से सक्रिय होने की हिम्मत नहीं रखते लेकिन इन सबके बावजूद, आप सामान्य, खुश और केंद्रित दिखने का फैसला करते हैं। यह तनाव, थकावट या असंतोष को छिपाते हुए काम पर खुश और व्यस्त होने का दिखावा करने का कार्य है।

दुनिया में तेजी से बढ़ रही 'प्लीसेंटीज्म'

'प्लीसेंटीज्म'इन दिनों दुनिया भर के वर्कप्लेसस पर एक बढ़ती हुई समस्या है। हालांकि, मनोवैज्ञानिकों की मानें तो अगर अनदेखा किया जाए तो अक्सर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

कैसे उत्पन्न होता है 'प्लीसेंटीज्म'?

प्लीसेंटीज्म वर्कप्लेस पर कई तरह के दबावों से उत्पन्न होता है। कर्मचारियों को लग सकता है कि उन्हें जज किए जाने या गैर-पेशेवर के रूप में देखे जाने से बचने के लिए सकारात्मक रवैया बनाए रखने की आवश्यकता है। कंप्टेटिव वर्कप्लेस में हमेशा उत्साही और प्रोडक्टिव दिखने की एक अव्यक्त अपेक्षा होती है। नौकरी जाने का अंदेशा और संस्थानों का प्रेशर, लोगों को इस ओर धकेल रहा। संस्थान, अक्सर इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि कर्मचारी भी इंसान हैं। उनको भी शारीरिक थकावट होती है, मानसिक तनाव होता है। उनके जीवन में अन्य सांसारिक समस्याएं हैं।

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