दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न के आरोपी को मिली जमानत रद्द कर दी है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा कि जांच के अहम चरण में राहत देना गलत था और आरोपी को 1 जुलाई को सरेंडर करने का आदेश दिया है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को तीन साल की बच्ची से गंभीर यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्ति को जमानत देने के निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि सत्र न्यायालय ने राहत देते समय मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया था। हाईकोर्ट ने आरोपी को 1 जुलाई को दोपहर 2 बजे संबंधित पॉक्सो कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश दिया है।

जस्टिस विनोद कुमार ने राज्य और पीड़िता की मां द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार कर लिया, जिसमें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के 7 मई के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश के तहत जनकपुरी पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता की धारा 64(1) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की धारा 6 के तहत दर्ज एक एफआईआर में आरोपी को नियमित जमानत दी गई थी।
निचली अदालत के फैसले में खामियां
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने आरोपी की गिरफ्तारी के महज एक हफ्ते बाद ही जमानत दे दी थी, जबकि जांच अभी भी एक महत्वपूर्ण चरण में थी। कोर्ट ने माना कि सत्र न्यायालय ने आरोपी को जमानत पर रिहा करने से पहले बच्चे के आरोपों और अन्य आसपास की परिस्थितियों पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि तीन साल की पीड़िता ने घटना के दिन अपनी मां से स्कूल में एक व्यक्ति द्वारा कथित रूप से छूने के बाद अपने निजी अंगों में दर्द की शिकायत की थी। हालांकि उसने शुरुआत में आरोपी का नाम नहीं लिया था, लेकिन बाद में उसने पुलिस के सामने उसकी पहचान की और उस जगह की भी निशानदेही की जहां कथित घटना हुई थी। कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह पता चले कि बच्चे या उसके माता-पिता के पास आरोपी को झूठा फंसाने का कोई मकसद था।
सबूतों और गवाहों पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
सीसीटीवी फुटेज का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह कथित घटना के दिन सुबह 8:13 बजे से 8:37 बजे के बीच स्कूल के जूनियर विंग में आरोपी की मौजूदगी की पुष्टि करता है। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने आरोपी के सुबह 8:37 बजे परिसर छोड़ने को अनुचित महत्व दिया, जबकि पीड़िता के बयान को नजरअंदाज कर दिया।
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि जूनियर स्कूल में आरोपी सहित केवल दो पुरुष कर्मचारी थे, जिससे इस बात की संभावना कम हो जाती है कि बच्चे ने कथित अपराधी की पहचान में गलती की हो। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि इतनी कम उम्र के बच्चे के बयानों का मूल्यांकन एक वयस्क के बयानों की तरह नहीं किया जा सकता है और बयानों में दिखने वाली विसंगतियों को जमानत के स्तर पर बच्चे के बयान को अविश्वसनीय मानने का आधार नहीं बनाना चाहिए।
जबकि निचली अदालत ने मेडिकल जांच पर भरोसा किया था जिसमें कोई बाहरी चोट नहीं दिखी थी, हाईकोर्ट ने कहा कि चोटों की अनुपस्थिति या जांच के दौरान बरामद टिशू पेपर पर कुछ नहीं मिलना, पीड़िता के बयान पर संदेह करने का कोई आधार नहीं है, खासकर जब जांच अभी भी चल रही थी। कोर्ट ने यह भी देखा कि बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए कई मुद्दे अभी भी जांच के दायरे में थे।
कानूनी मिसाल और सुप्रीम कोर्ट का हवाला
कोर्ट ने आरोपी द्वारा भरोसा किए गए पूर्व के एक मामले को अलग माना, यह देखते हुए कि उस मामले में पीड़िता एक वयस्क थी और जांच पूरी होने के बाद जमानत दी गई थी, जबकि वर्तमान मामले में पीड़िता केवल तीन साल की है और जांच जारी है।
पॉक्सो मामलों में जमानत देने पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर भरोसा करते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों को अपराध की गंभीरता, पॉक्सो अधिनियम की वैधानिक कठोरता और बाल पीड़ितों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखना चाहिए। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने गंभीर प्रकृति के आरोपों वाले मामले में जमानत देते समय महत्वपूर्ण कारकों को नजरअंदाज कर दिया।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, विवादित जमानत आदेश को रद्द कर दिया और आरोपी को 1 जुलाई, 2026 को दोपहर 2 बजे संबंधित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (पॉक्सो कोर्ट) के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश दिया। (एएनआई)
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