समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना लेकिर एलजीबीटी समुदाय के लिए कई सारे सुधारों की बात कही है। ऐसे में एक्टिविस्ट्स की प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। 

Supreme Court Verdict. समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करने के समूह में शामिल अंजलि गोपालन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हम निराश जरूर हैं लेकिन हमारी लड़ाई जारी रहेगी। अंजलि ने कहा कि देश में समलैंगिक विवाह को मान्यता न मिलना निराशाजनक रहा। कहा कि हम इसके लिए काफी समय से लड़ाई लड़ रहे हैं। अंजलि ने कहा अडॉप्शन को लेकर भी कुछ नहीं किया गया लेकिन इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बहुत अच्छी बातें कही हैं। गोपालन ने कहा कि जजों में भी इसे लेकर एक राय नहीं रही लेकिन यह लोकतंत्र है। हम अपने नागरिकों के बेसिक अधिकारों को नकार रहे हैं।

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21 याचिकाकर्ताओं ने दायर की थी याचिका

सुप्रीम कोर्ट में एलजीबीटी समुदायों के करीब 21 एक्टिविस्ट्स ने मिलकर समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग वाली याचिका दायर की थी। इसमें बच्चा गोद लेने की डिमांड भी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच में 3-2 से यह तय किया गया कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता न दी जाए। कोर्ट ने कहा कि संसद को इस पर कानून बनाने पर विचार करना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे कानून नहीं बना सकते हैं सिर्फ कानून की व्याख्या कर सकते हैं।

LGBTIQA+ समुदाय को क्या थी उम्मीद

LGBTIQA+ समुदाय को इस बात की उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके ही फेवर में आएगा। एक्टिविस्ट्स ने कहा कि समाज में विवाह को कानूनी मान्यता मिलने से उनकी कई समस्याएं हल हो जाती लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वह समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं देता है। याचिकाकर्ता हरीश अय्यर ने कहा कि भले ही फैसला हमारे हक में नहीं आया है लेकिन सुप्रीम का ऑब्जर्वेशन हमारे हक में है। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों पर भी जिम्मेदारी डाली है। एक्टिविस्ट प्रीजित पीके ने कहा कि यह हमारे लिए अच्छा दिन रहा क्योंकि 2014 और 2018 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाया है।

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