जस्टिस इंदु मल्होत्रा 27 अप्रैल, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनी थीं। करीब तीन साल की सेवा के बाद वह 21 मार्च 2021 को रिटायर हो गईं। उनके पिता ओमप्रकाश मल्होत्रा भी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील थे। अंतिम दिन वह चीफ जस्टिस बोबड़े की पीठ में बैठीं। 

चंडीगढ़। 5 जनवरी को पंजाब के बठिंडा से हुसैनीवाला जाते समय प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक (Pm security breach) का मामला सामने आया था। पीएम को 20 मिनट तक ओवरब्रिज पर फंसने के बाद लौटना पड़ा था। इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई है। सुप्रीम कोर्ट की रिटायर जज इंदु मल्होत्रा इसकी अध्यक्षता करेंगी। मूल रूप से बेंगलुरु की रहने वाली इंदु मल्होत्रा पिछले साल मार्च में ही सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुई हैं। वह पहली ऐसी महिला थीं जो अधिवक्ता से सीधे सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनीं। जस्टिस इंदु मल्होत्रा 27 अप्रैल, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बनी थीं। करीब तीन साल की सेवा के बाद वह 21 मार्च 2021 को रिटायर हो गईं। उनके पिता ओमप्रकाश मल्होत्रा भी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील थे। अंतिम दिन वह चीफ जस्टिस बोबड़े की पीठ में बैठीं। 

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इन अहम फैसलों में रहीं शामिल
सबरीमाला केस :
जस्टिस इंदु मल्होत्रा केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर फैसला देने वाली पीठ में थीं। उन्होंने चार पुरुष न्यायाधीशों से अलग राय जाहिर की थी। पुरुष न्यायाधीशों ने महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश देने की बात कही थी, जबकि इंदु मल्होत्रा ने इसके खिलाफ राय दी थी। उन्होंने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश देने की मांग को गलत बताया था। 

समलैंगिक यौन संबंध : इंदु मल्होत्रा समलैंगिक यौन संबंध मामले में फैसला सुनाने वाली पीठ का भी हिस्सा थीं। सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था। इंदु मल्होत्रा इसके अलावा व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखने वाली आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक ठहराने और उसे समाप्त करने वाली संविधान पीठ का भी हिस्सा रह चुकी हैं। यह फैसला जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने दिया था। 

30 साल सुप्रीम कोर्ट में की प्रैक्टिस : जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने 30 सालों तक सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस की। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ लॉ से 1983 में एलएलबी की डिग्री हासिल की। 1988 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की परीक्षा पास की। उसमें वो गोल्ड मेडलिस्ट रहीं। 2007 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का सीनियर एडवोकेट नामित किया गया। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में 30 साल बाद ऐसा मौका आया था। इनसे पहले लीला सेठ को ये ख्याति हासिल थी।

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