पश्चिम एशिया संकट, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव और सऊदी तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारत ने अचानक अपनी तेल रणनीति बदल दी। वेनेज़ुएला अब भारत का तीसरा सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया है। सस्ता भारी कच्चा तेल, रूस-ईरान सप्लाई संकट और ऊर्जा सुरक्षा ने वैश्विक ऑयल गेम बदल दिया।
नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाज़ार के समीकरण रातों-रात बदल चुके हैं। भारत ने अपनी तेल सोर्सिंग रणनीति में एक ऐसा चौंकाने वाला कदम उठाया है जिसने सऊदी अरब और अमेरिका जैसे पारंपरिक तेल दिग्गजों को भी पछाड़ दिया है। बदलते भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया के समुद्री रास्तों पर मचे बवाल के बीच, भारत का नया पसंदीदा तेल सप्लायर अब कोई खाड़ी देश या महाशक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसा देश बन गया है जो लंबे समय से प्रतिबंधों की मार झेल रहा था। एनर्जी कार्गो ट्रैकर 'Kpler' के ताज़ा और सनसनीखेज आंकड़ों ने पूरी दुनिया के नीति-निर्माताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

खाड़ी देशों में खलबली: सऊदी अरब की 'आधी' हुई हिस्सेदारी, अमेरिका भी हैरान!
मई के महीने में भारत के कच्चे तेल के आयात पैटर्न में आया बदलाव किसी बड़े सियासी उलटफेर से कम नहीं है। अब तक भारत के शीर्ष सप्लायरों में शामिल रहने वाले सऊदी अरब को इस महीने करारा झटका लगा है। अप्रैल में जहां सऊदी अरब भारत को 670,000 बैरल प्रति दिन (bpd) तेल भेज रहा था, वहीं मई में यह घटकर महज 340,000 bpd रह गया। विश्लेषकों के अनुसार, सऊदी अरब की 'आक्रामक मूल्य निर्धारण नीति' (महंगा तेल) ही उसकी गिरावट की मुख्य वजह बनी। इस रेस में अमेरिका भी पीछे छूट गया, क्योंकि भारत ने रियायती दरों पर मिलने वाले भारी कच्चे तेल (Heavy Crude) की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए हैं।
9 महीने का सन्नाटा और फिर... वेनेज़ुएला की वो 'खतरनाक' वापसी!
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सस्पेंस है वेनेज़ुएला की धमाकेदार एंट्री। पिछले लगातार नौ महीनों तक वेनेज़ुएला से भारत को एक बूंद तेल की सप्लाई नहीं हुई थी। लेकिन मई के पहले 20 दिनों में जो हुआ, उसने इतिहास बदल दिया। वेनेज़ुएला ने अचानक छलांग लगाते हुए लगभग 417,000 बैरल प्रति दिन (bpd) कच्चा तेल भारत भेजकर उसे देश का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना दिया। अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली अस्थायी ढील का फायदा उठाते हुए भारतीय रिफाइनरों ने वेनेज़ुएला के कम कीमत वाले भारी कच्चे तेल को हाथों-हाथ लिया, जिससे वेनेज़ुएला का वैश्विक निर्यात साल 2018 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।
होर्मुज़ स्ट्रेट का चक्रव्यूह: क्यों बदलना पड़ा भारत को अपना मास्टरप्लान?
आखिर भारत को अपनी इस रणनीति में इतना बड़ा बदलाव क्यों करना पड़ा? इसका जवाब छिपा है पश्चिम एशिया के समुद्री रास्तों में जारी गंभीर सैन्य गतिरोध में। होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ते तनाव और नाकाबंदी ने भारतीय रिफाइनरियों को अपने विकल्पों में विविधता लाने के लिए मजबूर कर दिया है। स्थिति इतनी नाजुक है कि एक अन्य प्रमुख आपूर्तिकर्ता, इराक से होने वाली सप्लाई फरवरी के 969,000 bpd से घटकर मई में महज 51,000 bpd रह गई। वहीं, सात साल बाद अप्रैल में शुरू हुआ ईरानी तेल का शिपमेंट भी अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी के कारण इस महीने फिर से ठप हो गया।
रिलायंस का 'सुपर गेम' और रूस-UAE का बरकरार दबदबा
वेनेज़ुएला से तेल आयात की इस रेस को मुख्य रूप से गुजरात में स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसी दिग्गज निजी रिफाइनरियों ने गति दी है। रिलायंस के अत्याधुनिक शोधन परिसर को विशेष रूप से उच्च सल्फर वाले भारी कच्चे तेल को कुशलतापूर्वक प्रोसेस करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो आर्थिक रूप से बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है। हालाँकि, वर्तमान में रूस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) अभी भी भारत के शीर्ष दो कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं, लेकिन तीसरे नंबर पर वेनेज़ुएला की इस तेज़ी से हुई वापसी ने यह साबित कर दिया है कि बदलते बाज़ार और प्रतिबंधों के खेल के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।


