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CORONA WINNER: पॉजिटिव-निगेटिव बीच जिंदगी ने दिया एक और टेस्ट का मौका, बहुत कुछ सिखाने वाली है इनकी कहानी

देश में हर दिन कोरोना के लाखों केस आ रहे रहे हैं। हजारों लोग मर भी रहे हैं, जबकि ठीक होने वालों की तादाद लाखों में है। फिर भी, इंसान मरने वालों का आंकड़ा देखकर डर और खौफ में जी रहा है। सबको लग रहा है हर कोई इस वायरस की चपेट में आ जाएगा, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। सावधानी, बचाव और पॉजिटिव सोच रखने वाले शख्स से यह बीमारी कोसों दूर भागती है।

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Bhopal, First Published Jun 13, 2021, 6:00 AM IST
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भोपालः ''कोरोना काल में एक शब्‍द बहुत चर्चित हुआ- टेस्‍ट। लेकिन यहां कोरोना बीमारी के ‘पॉजिटिव’ और ‘निगेटिव’ टेस्‍ट की बात नहीं हो रही। दरअसल, कोरोना ने हमें एक और टेस्‍ट से गुजरने का मौका दिया। वो टेस्‍ट है- अपने शरीर से रिश्‍ते को जानने का। यह बीमारी पूछती है कि हम अपने शरीर को, उसकी हरकतों को, उसकी तासीर को कितना जानते हैं। बीमारी पता करती है कि हम अपने शरीर, उसके द्वारा दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं, संकेतों को कितना समझ पाते हैं। यह बीमारी इस बात की परीक्षा लेती है कि हमें अपने शरीर की कितनी परवाह है। हम उसकी बात को कितना सुनते हैं, उसके साथ कितना संवाद करते हैं। यदि हमारा अपने शरीर से, उसकी तासीर से गहरा संवाद है, उसकी बात को हम समझते हैं या समझने की कोशिश करते हैं और उसे तवज्‍जो देते हैं, तो कोरोना हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऐसा करके हम कोरोना को शरीर की दहलीज पर ही रोक पाने में सक्षम हो जाते हैं।''

Asianetnews Hindi के श्रीकांत सोनी ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रहने वाले गिरिश उपाध्याय से बात की। पति-पत्नी और बेटी ने कोरोना से कैसे जंग जीती, पढ़िए शब्दशः

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'16 अप्रैल की हमारे परिवार ने 'पॉजिटिव' होकर कोरोना का मान रख लिया। मैं, पत्‍नी और बेटी एक साथ संक्रमित हुए। डॉक्‍टर ने जब जानकारी दी, उसी समय सोच लिया कि इस ‘पॉजिटिव’ को पूरी ‘पॉजिटिविटी’ के साथ ग्रहण करना है। इसीलिए बताया- ‘हमने पॉजिटिव होकर कोरोना का मान रख लिया।' मेरा एक ही निवेदन है- कोरोना को नोटिस कीजिए, उसकी परवाह कीजिए। उसके लक्षणों को ‘रिकग्‍नाइज’ कीजिए लेकिन प्लीज उन्‍हें ‘इग्‍नोर’ मत करिए।'

हमारी सतर्कता और आसपास हो रही घटनाओं से लिया गया सबक आया काम

कोरोना की पहली-दूसरी लहर में एक बड़ा अंतर यह देखने में आया है कि हम इस खतरे से बेपरवाह हो गए थे। पहली लहर में हम कोरोना से डरे थे। हालात पर थोड़ा काबू भी कर पाए, लेकिन दूसरी लहर में हमने डरना छोड़ दिया। यही लापरवाही हमें ले डूबी। दरअसल, कोरोना काल के संक्रमण और लॉकडाउन जैसी स्थिति के चलते हमने घर से बाहर निकलने के बजाय छत पर घूमना शुरू किया। सड़क किनारे का घर होने के कारण छत पर धूल हो जाती है। पत्‍नी ने एक दिन छत की सफाई कर डाली। शाम को उसके गले में खराश हो गई। धूल से एलर्जी हो या न हो पर धूल में काम करने के कारण गले में खराश का होना स्‍वाभाविक है। पत्‍नी ने पहला निष्‍कर्ष यही निकाला कि धूल साफ करने के कारण उसका गला खराब हो गया। कोरोना में एक गफलत यह भी होती है कि लक्षणों का कारण पता नहीं चलता। हम जान नहीं पाते कि संक्रमण हमें कहां से और किस कारण से हुआ। लेकिन इसी समय हमारी सतर्कता और अपने आसपास हो रही घटनाओं से लिया गया सबक हमारे काम आया। पत्‍नी का बुखार नापा तो वह 99 था। माथा ठनका। सामान्‍य तौर पर गले की खराश से एकदम बुखार नहीं होता। बुखार के संकेत को गंभीरता से लेते हुए तत्‍काल डॉक्‍टर से संपर्क किया। डॉक्‍टर ने वो दवाएं सुझाईं जो कोरोना होने पर दी जाती हैं। पहला लक्षण दिखने के 24 घंटे के अंदर कोरोना वाला इलाज शुरू कर चुके थे। बेटी ने अगले दिन कहा- उसे थोड़ी थकान और हरारत महसूस हो रही है। यह भी सामान्‍य बात थी। इसका भी प्रत्‍यक्ष कारणसामने था। वो वर्क फ्रॉम होम में रोज करीब 12 घंटे काम कर रही थी। थकान स्‍वाभाविक है। बेटी की थकान को भी हमने कोरोना के लक्षणों से जोड़कर देखा। फैसला किया कि सबसे पहले कोरोना का टेस्‍ट कराया जाए।

रिपोर्ट में देरी की बात सुनकर होनी लगी थी चिंता...

कोरोना काल में टेस्‍ट कराना आसान नहीं है। सरकारी अस्‍पतालों में इसके लिए भारी भीड़ है, प्राइवेट में यह काम खर्चीला है। आसपास के सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों को तलाशा, कुछ में जाकर देखा पर वहां टेस्‍ट नहीं हो रहे थे। हमारे एक परिचित ने बताया कि मिसरोद की सरकारी डिस्‍पेंसरी में टेस्‍ट हो रहे हैं। आप वहां जाकर करवा लें। भीड़ से बचने की एक वजह यह भी थी कि अगर वास्‍तव में कोरोना हुआ तो हमारी वजह से कहीं और लोगों को संक्रमण न हो जाए। खैर, टेस्‍ट कराने घर से करीब 12 किमी दूर मिसरोद की डिस्‍पेंसरी पहुंचे। डेढ़ घंटे बाद टेस्‍ट हो गया। रिपोर्ट का इंतजार था। अगले दिन पता चला कि रिपोर्ट 3 से 4 दिन में आएगी, हमें चिंता हुई। हमने डिस्‍पेंसरी के डॉक्‍टर से संपर्क किया। उन्‍होंने सलाह दी कि आरटीपीसीआर की रिपोर्ट का इंतजार ना करें, रैपिड टेस्‍ट करा लें। उसका नतीजा हाथों-हाथ पता चल जाता है। रैपिड टेस्‍ट करवा लिया। वही हुआ जिसकी आशंका थी। तीनों पॉजिटिव थे। डॉक्‍टर ने 15 दिन होम क्‍वारंटीन रहने की हिदायत के साथ कोरोना इलाज की सारी दवाएं लिख दीं।

पॉजिटिव हूं या नहीं...रैपिड टेस्ट की पट्टी बार-बार देखता रहा...

जब पत्‍नी-बेटी को शुरुआती लक्षण दिखाई दिये, तब मुझे कोई लक्षण नहीं था। मैं अपनी सामान्‍य दिनचर्या पूरी कर रहा था। मेरे लिए सबकुछ ठीकठाक था। फिर भी एहतियात के तौर पर घर में लक्षण दाखिल होने के 24 घंटे के अंदर सभी का RTPCR टेस्‍ट करा लिया था। रैपिड टेस्‍ट की पट्टी पर आने वाले संकेत देखकर यह समझ में नहीं आ रहा था कि मैं पॉजिटिव हूं या नहीं। काफी देर तक पट्टी को इधर-उधर घुमाने, उजाले में जाकर उसे देखने के बाद डॉ. ने कहा- धुंधला सा दिख तो रहा है, मानकर चलिए कि आप भी पॉजिटिव हैं। जब घर में दो लोग पॉजिटिव हैं तो तय है इनके संपर्क में आने के कारण आप बचे नहीं होंगे।

क्‍वारंटीन तो हो गए लेकिन जिंदगी का असली सबक यही मिला..

होम क्‍वारंटीन या आइसोलेशन में रहना आपके धैर्य की परीक्षा तो लेता ही है, वह इस बात का भी टेस्‍ट लेता है कि आप कितने सामाजिक हैं। आपने जिंदगी में पैसा, पद, प्रतिष्‍ठा भले ही कितनी भी कमाई हो, आपने दूसरों से संबंध रखने की पूंजी कितनी कमाई है? दरअसल, आइसोलेशन में सबसे ज्‍यादा आपको इसी पूंजी की जरूरत होती है। यही पूंजी काम आती है। जैसा मैंने कहा- आइसोलेशन का पूरी तरह पालन करना, एक घर में रहते हुए संक्रमित व्‍यक्ति से खुद को बचाए रखना मुश्किल होता है। लेकिन संयोग से हमारे साथ ऐसा नहीं था। हम तीन लोग थे, तीनों संक्रमित। मुझे याद है- पॉजिटिव आने के बाद जब डॉक्‍टर से पूछा था कि अब क्‍या करना होगा। उन्होंने हंसते हुए कहा था- कुछ दिन घर में हॉलीडे मनाइए।

मौत का आंकड़ा नहीं, ठीक हो रहे लोगों को रखा ध्यान में...

डॉक्‍टर ने वह बात बहुत हलके अंदाज में कही थी। शायद उसका मकसद यह रहा हो कि हमें पॉजिटिव आने के तनाव से थोड़ा दूर करे, लेकिन उसकी कही बात पर सभी मरीजों को ध्‍यान देना चाहिए। दरअसल, कोरोना बीमारी से ज्‍यादा भारी उसका डर और उस डर से पैदा होने वाला तनाव है। जैसे ही यह खबर मिलती है कि आप कोरोना का शिकार हो गए हैं या आप पॉजिटिव हैं, ज्‍यादातर लोगों को एक झटका सा लगता है। यह सच है कि कोरोना के मरीज बहुत अधिक पीड़ा से गुजर रहे हैं। उनमें से कई अलग-अलग कारणों से मौत का शिकार भी हो रहे हैं, लेकिन कोरोना से ठीक हो जाने वालों की संख्‍या कई गुना है। बेहतर होगा आइसोलेशन में हम अपना ध्‍यान शिकार हो जाने वालों के बजाय, शिकारी को पछाड़ने और पछाड़ देने वालों पर लगाएं।

बुरे वक्त में काम आता है आपका बनाया हुआ संबंध

आइसोलेशन में सबसे ज्‍यादा मुश्किल रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के मामले में होती है। चूंकि आपको होम क्‍वारंटीन रहना है, आप बाहर नहीं निकल सकते। घर में यदि किसी चीज की जरूरत हो या फिर रोजमर्रा वाली कोई चीज अचानक खत्‍म हो जाए तो क्‍या किया जाए। वैसे तो ऐसी चीजों की होम डिलेवरी की सुविधाएं उपलब्‍ध हैं, लेकिन हमारा अनुभव रहा है कि कई बार ये सुविधा भी आपको राहत नहीं दे पाती। या तो उस दुकान पर वह सामान खत्‍म हो गया होता है या फिर उसका आपके इलाके में डिस्ट्रीब्यूशन नहीं होता। ऐसे में आपके संबंध ही काम आते हैं। ऐसे समय वे लोग काम आते हैं जिनकी या तो आपने कभी मदद की हो या जो सचमुच आपको चाहते हों।

दूध वाले को मना किया, लेकिन पड़ोसी ने उठाया रिस्क

एक दिन खुद हमारे सामने एक संकट आया। कॉलोनी में दूध बांटने वाले को हमें मना करना पड़ा कि वो घर दूध ना दे। यह दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए जरूरी था। मना तो कर दिया लेकिन दूध की जरूरत तो होती ही है। ऐसे में कॉलोनी के अध्‍यक्ष पवन गुरू ने यह बीड़ा उठाया। वे हमारे घर सप्‍लाई किया जाने वाला दूध अपने घर मंगाते और रोज हमें पहुंचाते। उन्‍होंने हमारी सब्‍जी आदि की जरूरतों को पूरा किया।

संकट के समय आया 50 साल पुराने दोस्त का कॉल

जरूरत सिर्फ सामान की ही नहीं होती। कई बार आर्थिक संकट आ जाता है। सामान तो फिर भी कुछ लोग पहुंचा देते हैं, लेकिन आर्थिक जरूरत पूरी करने का काम बहुत कम लोग करते हैं। मुझे याद है- जब परिवार के संक्रमित होने की सूचना सोशल मीडिया पर डाली तो इंदौर से मेरे स्‍कूल के जमाने के एक दोस्‍त का कॉल आया। यार, चिंता मत करना, तुम अपना अकाउंट नंबर भेज दो। मेरे सामर्थ्‍य में जितना होगा, तुम्‍हें भेज दूंगा...। आप सोच नहीं सकते कि 50 साल पुरानी दोस्‍ती के इस रूप ने मुझे कितना संबल दिया होगा। जमाना अपने अनुभव से कहता है कि मुसीबत में अपने ही काम आते हैं, तो वह गलत नहीं कहता।

सबसे मुश्किल होता है अकेलेपन को काटना...

आइसोलेशन में सबसे बड़ी मुश्किल होती है अकेलेपन को काटना। सबसे अलग-थलग रहना और एक अछूत सी जिंदगी जीना। यह स्थिति आपको मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करती है। इसमें आप चिड़चिड़ेपन का शिकार हो सकते हैं। कहने में यह बहुत आसान है कि हमें इन भावों को हावी नहीं होने देना है, लेकिन वास्‍तव में ऐसा करना मुश्किल होता है। जहां तक संभव हो शारीरिक और मानसिक दोनों संतुलन बनाए रखें। अकेलेपन को गीत संगीत सुनकर या अपनी रुचि का कोई और काम करके काटने की कोशिश करनी चाहिए। मैंने गीत संगीत भी सुना और कविताएं भी लिखीं, लेकिन इसके अलावा मेरा सबसे ज्‍यादा समय जिस बात में कटा वो खुद के बजाय दूसरों की तकलीफ को सुनने, उनकी कोई न कोई मदद करने में। दरअसल, जिस समय हमारा परिवार बीमार था, उस समय परिवार के कई और सदस्‍य भी बीमार थे। इनमें से एक भोपाल में, दो इंदौर में और एक लखनऊ में थे। रोज उनका फोन आता या संपर्क होता और रोज कोई नई परेशानी मौजूद होती। ये तीनों ही मामले ऐसे थे जिन्‍हें डॉक्‍टरों ने गंभीर से लेकर अति गंभीर की श्रेणी में रखा हुआ था। ऐसे में फोन की घंटी किसी अनहोनी की आशंका के साथ ही बजती सुनाई देती थी।

पॉजिटिव हैं तो आसपास नजर जरूर घुमाएं...

अगर आप कोरोना का शिकार हो गए हैं तो अपने आसपास नजर घुमाकर जरूर देखें। निश्चित रूप से आपको अपने से ज्‍यादा कष्‍ट और खतरे में डले लोग दिखाई देंगे। आप पहले तो ईश्‍वर का धन्‍यवाद करें कि उनकी तुलना में आप कहीं बेहतर हालत में हैं। दूसरा यह सोचें कि बीमारी का शिकार हो गए अपनों की आप किस तरह मदद कर सकते हैं। इस तरह आपका समय भी कटेगा और दूसरों की मदद न भी हो पाए तो भी उन्‍हें एक संबल मिलेगा। मदद करने के मामले में एक बात और कहना चाहूंगा। कोशिश करें कि आप किसी को झूठा दिलासा न दें। यदि कोई आपसे मदद मांग रहा है तो मानकर चलिए कि वह सचमुच कष्‍ट में है। उसे मदद की जरूरत है। आपकी कोशिश सफल होगी या नहीं इस पर जाने के बजाय आप इस पर जाएं कि कोशिश करके तो देखता हूं...हो सकता है शायद काम बन जाए...यह बात मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं...मुझे कई मामलों में सफलता नहीं मिली लेकिन कई मामलों में जान बचाने तक की हद वाली मदद मिल गई...सिर्फ इसलिए कि मैंने कोशिश जारी रखी।

दवाई के साथ-साथ कुछ देशी उपाय भी किया...

हां, दो तीन बातें कोरोना पीडित होने पर जरूर फायदा देती हैं। पहला गरम पानी पीना, दूसरा गरम पानी के गरारे करना और तीसरा भाप लेना। लेकिन इसे करते समय भी आप अपने शरीर की तासीर और क्षमता का ध्‍यान रखें, पर करें जरूर। कोई भी उपाय जरूरत से ज्‍यादा मात्रा में न अपनाएं, यह उलटे नुकसान कर सकता है। हमने अपना इलाज डॉक्‍टर की देखरेख में ही किया और वो ही दवाएं ली जो उसने कहीं। उतने ही दिन लीं जितने दिन के लिए उसने लिखीं। सिटी स्‍कैन कराया जरूर लेकिन डॉक्‍टर के कहने के बाद। उसमें भी सिर्फ दो लोगों का, तीसरे को डॉक्‍टर ने जरूरत नहीं समझी तो नहीं कराया।

कोरोना को हराकर भी हीरो ना बनें, प्रॉपर सावधानी बरतें...

कुल मिलाकर कोरोना से लड़ना और उसे हराना कोई मुश्किल काम नहीं है, बशर्ते आप पूरी सावधानी बरतें। अपनी समझ का इस्‍तेमाल करें और खुद के साथ अनावश्‍यक प्रयोग न करें। समय पर ले लिया गया इलाज और बरती गई एहतियात आपको इस संकट से पूरी तरह बचा सकती है। और हां, कोरोना होने से पहले और कोरोना होने के बाद भी उससे बचने का प्रोटोकॉल नहीं भूलना है...यानी मास्‍क, सेनेटाइजेशन और सोशल डिस्‍टेंसिंग। हमारे डॉक्‍टर ने भी यह बात कही और हमें भी यह महसूस हुआ कि हम पर कोरोना का ज्‍यादा असर शायद इसलिए नहीं हुआ क्‍योंकि मैंने और पत्‍नी ने कोरोना वैक्‍सीन का पहला डोज ले रखा था। इसलिए आप भी पहली फुरसत में वैक्‍सीन लगवाएं। चाहे कोरोना टेस्‍ट कराने का मामला हो या वैक्‍सीन लगवाने का, थोड़ी मुश्किल जरूर आएगी, क्‍योंकि कई लोग इसके लिए इंतजार की लाइन में लगे हैं, पर उस लाइन से घबराकर आप टेस्‍ट कराने या वैक्‍सीन लगवाने का इरादा छोड़ें नहीं। सर्वे भवन्‍तु सुखिन: सर्वे सन्‍तु निरामय:

Asianet News का विनम्र अनुरोधः आइए साथ मिलकर कोरोना को हराएं, जिंदगी को जिताएं...जब भी घर से बाहर निकलें माॅस्क जरूर पहनें, हाथों को सैनिटाइज करते रहें, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। वैक्सीन लगवाएं। हमसब मिलकर कोरोना के खिलाफ जंग जीतेंगे और कोविड चेन को तोडेंगे। 
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