जैसे रात चाहें कितनी काली क्यों न हो उसे सूरज का उजाला खत्म कर ही देता है। कोरोना से जंग जीतने वाले उसी उजाले की तरह हैं। इनकी कहानियां, इनके हौसले आपको विपरीत परिस्थितियों में लड़ने का हौसला देंगे। हम आपके लिए ला रहे हैं ऐसी ही कुछ आपबीती। 

लखनऊ। यूपी की राजधानी अप्रैल-मई में शोक में डूबी हुई थी। एंबुलेंस के सायरन लोगों की धड़कनें तेज कर देती थी। किसी भी मोहल्ले या काॅलोनी में सायरन की आवाजें मन को बेचैन करने के लिए काफी होते। चारों ओर मौत की खबरें, अस्पताल में बेड की कमी, जीवनदायिनी आक्सीजन के लिए मारामारी और इसके अभाव में होती मौतें। नफासत का शहर लखनऊ रो रहा था और यहां के वाशिंदों की नम आंखें बेबसी की कहानी बयां कर रही थीं। हालांकि, अदृश्य दुश्मन को अपने हौसलों से मात देने वालों की संख्या कम नहीं थी। विपरीत परिस्थितियों में भी इन लोगों ने जंग जीत ली थी। ऐसे ही एक बुलंद हौसले वाले प्रसून पांडेय हैं। कोरोना से कई रिश्तेदारों को खो चुके प्रसून ने परिवार के संबल और साथ से यह जीत ली है।

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Asianetnews Hindi के धीरेंद्र विक्रमादित्य गोपाल ने प्रसून पांडेय से बात की है। मूलरुप से इलाहाबाद के रहने वाले प्रसून ने इस जंग को कैसे जीता उस पर बातचीत की है। 

बुखार आने के दस दिन बाद टेस्ट कराया तो पता चला पाॅजिटिव हूं

कोरोना से लखनऊ में हाहाकार मचा हुआ था। दिन-रात एंबुलेंस के सायरन मन को विचलित कर रहे थे। हर दिन कोई ऐसी खबर जो घबराहट पैदा कर रहे थे। 15 अप्रैल को बुखार आया। शरीर तपने लगा था, थकान भी महसूस हुई। थोड़ा शक हुआ लेकिन सामान्य बुखार मानकर दवा लेने लगा। एक सप्ताह में ही बुखार ठीक भी हो गया। 29 अप्रैल को मैं खुद को स्वस्थ मान लिया। लेकिन 29 अप्रैल के बाद घर के लोग बीमार पड़ने लगे। इसी बीच फादर-इन-लाॅ की डेथ हो गई। इस घटना के दौरान मैं, पत्नी और बिटिया उनके साथ ही थे। इसके बाद हम सबने कोविड टेस्ट कराया। मेरा रिजल्ट पाॅजिटिव आ गया। घर में एक चार साल के बच्चा भी पाॅजिटिव हो गया। घर में 9 लोगों में छह लोग पाॅजिटिव हो गए थे। इसी दौरान पत्नी के बड़े पापा और उनकी बहन के बारे में भी सूचना मिली। पूरा घर शोक में डूबा हुआ था। 

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हर ओर उदासी ही उदासी, मेरा भी मन बैठा जा रहा था

लखनऊ में कोरोना केसों में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही थी। चारो ओर शोक ही शोक। तीन-तीन मौतों के बाद ससुराल में भी स्थितियां बेहद खराब थी। आईसोलेशन में था लेकिन मन में डर भी समाने लगा था। पत्नी किसी तरह खुद को संभाल सबका ख्याल रख रही थी। मेरा भी हौसला अब जवाब दे रहा था। लेकिन मन में ठान लिया था कि कोरोना को किसी तरह भी मात दूंगा। 

जब मन उदास होता तो बिटिया से बतियाता, उसके बारे में सोचता

हर ओर से मौत की ही खबरें आ रही थी। मोबाइल छूने तक का मन नहीं होता। मन में कभी बेहद निराशा वाली बातें आती तो कभी थोड़ा संबल भी मिलता। जब भी उदास होता तो बिटिया से बतियाता। उसके बारे में सोचता। घरवालों के बारे में सोचता। सब फोन पर बात कर मन को संबल देते। 

डाॅक्टर की एक-एक बात का किया पालन

पाॅजिटिव रिपोर्ट आने के बाद डाॅक्टर के बताए दवाइयों को समय से खाया। खाने में दाल-रोटी और सलाद को लेता। नारियल पानी और संतरे का जूस खूब पीता। 

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योग करने से मन और शरीर को सुकून मिलता

पाॅजिटिव रहने के दौरान दवाइयों के साथ साथ योग भी किया। प्राणायाम, अनुलोम-विलोम को करता रहा। इसके अलावा खूब सोता।

धीरे-धीरे सुधार होने लगा और...

मेडिकेशन के साथ मेडिटेशन का फायदा मिला। धीरे-धीरे सुधार होने लगा। घर के अन्य लोग भी ठीक हो रहे थे। संकट के बादल छंटने लगे थे। 10 मई को घर के तीन पाॅजिटिव लोगों की रिपोर्ट आई तो वे नेगेटिव हो चुके थे। अगले दिन मेरी भी रिपोर्ट नेगेविट होने की आ गई। 



किसी भी परिस्थिति में मन को बेचैन न होने दें

कोरोना पाॅजिटिव होने के बाद मन से उल्टे-सीधे ख्याल नहीं आने देना चाहिए। इसके लिए मैंने सबसे पहले मोबाइल का कम से कम उपयोग किया। सोशल मीडिया से दूरी बनाई। दिनचर्या में बदलाव किया। 

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